Sunday, 4 February 2018

तंत्र—सूत्र (भाग—1)

तंत्र—सूत्र (भाग—1)
ओशो

तंत्र विज्ञान है, और वह परमाणु—विज्ञान से भी ज्‍यादा गहन विज्ञान है। परमाणु विज्ञान पदार्थ से संबंधित है; तंत्र तुमसे संबंधित है। और तुम सदा ही किसी भी परमाणु—ऊर्जा से अधिक खतरनाक हो। तंत्र तुमसे, जीवित कोशिका से, स्‍वयं जीवन चेतना से संबंधित है। यही वजह है कि काम या सेक्‍स में तंत्र की इतनी गहरी रूचि है। जो व्‍यक्‍ति जीवन और चेतना में रूचि रखता है। वह अपने काम में दिलचस्‍पी लेगा।
क्‍योंकि काम जीवन का स्‍त्रोत है, प्रेम का स्‍त्रोत है। चेतना का स्‍त्रोत है। चेतना के जगत में जो भी घट रहा है। उसका आधार काम है। और अगर कोई साधक काम में उत्‍सुक नहीं है। वह दार्शनिक हो सकता है वह साधक नहीं है। और दर्शनशास्‍त्र कामोबेश कचरा है। जो व्‍यर्थ की चीजों के संबंध में ऊहापोह करता है।
तंत्र की उत्‍सुकता दर्शन में नहीं है। उसकी उत्‍सुकता वास्‍तविक और अस्‍तित्‍वगत जीवन में है। तंत्र कभी नहीं पूछता है कि क्‍या ईश्‍वर है, क्‍या मोक्ष है। क्‍या स्‍वर्ग—नरक है। तंत्र जीवन के संबंध में बुनियादी प्रश्‍न पूछता है। यही कारण है कि काम या सेक्‍स और प्रेम में उसकी इतनी रूचि है। काम और प्रेम बुनियादी है।

ओशो
 


तंत्र में प्रवेश—(प्रवचन—पहला)


सूत्र:

देवी कहती है:
हे शिव, आपका सत्‍य क्‍या है?
यह विस्‍मय—भरा विश्‍व क्‍या है?
इसका बीज क्‍या है?
विश्‍व–चक्र की धुरी क्‍या है?
रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे
यह जीवन क्‍या है?
देश और काल, नाम और प्रत्‍यय के परे जाकर
हम इसमें कैसे पूर्णत: प्रवेश करें?
मेरे संशय निमूर्ल करें।

 कुछ भूमिका की बातें।
एक कि विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं हैवह दार्शनिक नहीं है। सिद्धांत इसके लिए अर्थ नहीं रखता। यह उपाय कीविधि की चिंता करता हैसिद्धांत की कतई नहीं। तंत्र शब्द का अर्थ ही है विधिउपायमार्ग। इसलिए यह कोई मीमांसा नहीं हैइस बात को ध्यान में रख लें। बौद्धिक समस्याओं और उनके ऊहापोह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह चीजों के 'क्योंकी चिंता नहीं लेताउनके 'कैसेकी चिंता लेता हैसत्य क्या है इसकी नहींवरन इसकी कि सत्य को कैसे उपलब्ध हुआ जाए।
तंत्र का अर्थ विधि है। इसलिए यह एक विज्ञान—ग्रंथ है। विज्ञान 'क्योंकी नहीं, 'कैसेकी फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता है. यह अस्तित्व क्यों हैविज्ञान पूछता है. यह अस्तित्व कैसे हैजब तुम कैसे का प्रश्न पूछते होतब उपायविधि महत्वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्यर्थ हो जाते हैंअनुभव केंद्र बन जाता है। तंत्र विज्ञान हैतंत्र दर्शन नहीं है। दर्शन को समझना आसान हैक्योंकि उसके लिए सिर्फ मस्तिष्क की जरूरत पड़ती है। यदि तुम भाषा जानते होयदि तुम प्रत्यय समझते हो तो तुम दर्शन समझ सकते हो। उसके लिए तुमको बदलने कीसंपरिवर्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। तुम जैसे हो वैसे ही बने रहकर दर्शन को समझ सकते हो। लेकिन वैसे ही रहकर तंत्र को नहीं समझ सकते। तंत्र को समझने के लिए तुम्हारे बदलने की जरूरत रहेगीबदलाहट की ही नहींआमूल बदलाहट की जरूरत होगी। जब तक तुम बिलकुल भिन्न नहीं हो जाते होतब तक तंत्र को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि तंत्र कोई बौद्धिक प्रस्तावना नहीं हैवह एक अनुभव है। और जब तक तुम अनुभव के प्रति संवेदनशीलतैयारखुले हुए नहीं होतेतब तक यह अनुभव तुम्हारे पास आने को नहीं है।
दर्शन की फिक्र तुम्हारे मन के साथ है। उसके लिए तुम्हारा मस्तिष्क काफी हैउसको तुम्हारी समग्रता नहीं चाहिए। तंत्र तुमको तुम्हारी समग्रता में मांगता है। यह बहुत गहरी चुनौती हैइसमें तुम पूरे और इकट्ठे होकर ही उतर सकते हो। तंत्र खंडित नहीं है। उसकी अगवानी के तरह के रुझानतरह की यात्राऔर ही तरह के मन की जरूरत।
यही कारण है कि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक प्रश्न जैसे दिखते हैं। विज्ञान भैरव तंत्र देवी के प्रश्नों से शुरू होता है। और सभी प्रश्न दर्शन के तल पर हाथ में लिए जा सकते हैं। दरअसल कोई भी प्रश्न दो ढंग से हल किया जा सकता है. दार्शनिक ढंग से अथवा समग्रता पूर्वकबौद्धिक ढंग से अथवा अस्तित्वगत रूप से।
उदाहरण के लिए अगर कोई पूछेप्रेम क्या है? तो तुम उस प्रश्न का उत्तर बौद्धिक तल पर दे सकते होकोई सिद्धांत प्रस्तावित कर सकते होकिसी विशेष परिकल्पना के लिए दलील दे सकते हो। तुम एक व्यवस्थाएक सिद्धांतएक मतवाद खड़ा कर सकते हो। और हो सकता है कि प्रेम का तुमको बिलकुल पता न हो।
मतवाद गढ़ने के लिए अनुभव की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि तुम जितना कम जानते हो उतना ही अच्छा। क्योंकि तब तुम बेहिचक व्यवस्था प्रस्तावित कर सकते हो। केवल अंधा आदमी आसानी के साथ प्रकाश की व्याख्या कर सकता है। जब तुम नहीं जानते होतब ढीठ होते हो। अज्ञान हमेशा ढीठ होता हैज्ञान झिझकता है। जितना तुम जानते हो उतनी ही पांव के नीचे की जमीन खिसक नजर आती है। जितना तुम जानते हो उतना ही तुमको तुम्हारे अज्ञान का अनुभव होता है। और जो सच में ही ज्ञानी हैंवे अज्ञानी हो जाते हैं। वे बच्चों की तरह या शो की तरह सरल हो जाते हैं।
इसलिए जितना कम जानते हो उतना बेहतर। मीमांसक होनामतवादी होनामूढ़ाग्रही होना सचमुच आसान है। किसी भी प्रश्न को बुद्धि के तल पर हल करना सरल है।
लेकिन किसी प्रश्न को अस्तित्वगत रूप से हल करनाउसे सोचना नहींउसे जीनाउसमें जीना और उसके द्वारा अपने को पूरी तरह बदल जाने देना कठिन है। उसका अर्थ हुआ कि प्रेम को जानने के लिए तुमको प्रेम में उतरना पड़ेगा। वह खतरनाक है। क्योंकि तब तुम वही न रहोगे जो थे। अनुभव तुमको बदल देगा। जिस क्षण तुम प्रेम में प्रवेश करते होतुम एक दूसरे व्यक्ति में प्रवेश करते हो। और तब जब तुम उसके बाहर निकलोगेतब तुमको तुम्हारा पुराना चेहरा पहचानने को नहीं मिलेगा। वह चेहरा अब तुम्हारा रहा नहीं। एक विच्छिन्नताएक टूट पैदा हो चुकेगी। अब एक अंतराल आ गया। पुराना आदमी मर चुका और उसकी जगह एक नया आदमी आ गया है। उसे ही पुनर्जन्म कहते हैंद्विज कहते हैं।
तंत्र गैर—दार्शनिक है और अस्तित्वगत है। इसलिए यद्यपि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक मालूम होते हैंलेकिन शिव उत्तर उसी ढंग से नहीं देते। इस बात को आरंभ में ही समझ लेना बेहतर होगा। नहीं तो तुम हैरानी में पड़ोगे कि शिव क्यों उनके एक प्रश्न का भी उत्तर नहीं देते! जो भी प्रश्न देवी पूछती हैंशिव उनके उत्तर ही नहीं देते। और तो भी वे उत्तर देते हैं। और सच तो यह है कि केवल शिव ने ही उनके उत्तर दिए हैंकिसी और ने नहीं। लेकिन उनके उत्तर भिन्न तल के हैं।
देवी पूछती हैं : प्रभोआपका सत्य क्या हैशिव इस प्रश्न का उत्तर न देकर उसके बदले में एक विधि देते हैं। अगर देवी इस विधि के प्रयोग से गुजर जाएं तो वे उत्तर पा जाएंगी। इसलिए उत्तर परोक्ष हैप्रत्यक्ष नहीं। शिव नहीं बताते हैं कि मैं कौन हूं वे एक विधि भर बताते हैं। वे कहते हैं. यह करो और तुम जान जाओगी।
तंत्र के लिए करना ही जाननाकोई जानना जानना नहीं। जब तक तुम कुछ करते नहींजब तक बदलते नहींजब तक बुद्धि के अतिरिक्त किसी अन्य ही आयाम में नहीं प्रवेश करतेतब तक कोई उत्तर नहीं है। उत्तर तो दिए जा सकते हैंलेकिन वे सब के सब झूठे होंगे। सभी दर्शन झूठे हैं।
तुम एक प्रश्न पूछते हो और दर्शन एक उत्तर दे देता हैउससे तुम चाहे संतुष्ट होते हो या नहीं होते हो। यदि संतुष्ट हुए तो तुम उस दर्शन के अनुयायी हो जाते होलेकिन तुम वही के वही रहते हो। और यदि नहीं संतुष्ट हुए तो दूसरे दर्शन की खोज में निकल चलते हो जिनसे संतुष्टि मिल सके। लेकिन तुम वही के वही रहते होअछूते रहते होअपरिवर्तित रहते हो।
इसलिए तुम हिंदू हो कि मुसलमान हो कि ईसाई हो कि जैन होइससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। हिंदू मुसलमान या जैन के मुखौटे के पीछे जो असली व्यक्ति हैवह वही रहता है। सिर्फ शब्दों का या वस्त्रों का भेद है। चाहे वह चर्च जाता हो कि मंदिर जाता हो कि मस्जिद जाता होवह वही रहता है। सिर्फ चेहरों का फर्क है। और वे चेहरे झूठे हैंवे मुखौटे भर हैं। और मुखौटों के पीछे वही आदमी है—वही क्रोधवही आक्रामकतावही हिंसावही लोभवही लिप्सा—सब कुछ वही का वही है। क्या मुस्लिम कामुकता हिंदू कामुकता से भिन्न हैक्या ईसाई हिंसा और हिंदू हिंसा में फर्क हैवह एक ही है। हकीकत एक हैसिर्फ वस्त्र भिन्न हैं।
तंत्र को तुम्हारे वस्त्रों से कुछ लेना—देना नहीं हैउसे सीधे तुमसे लेना—देना है। अगर तुम प्रश्न पूछते हो तो उससे इतना ही पता चलता है कि तुम कहां हो। और उससे यह भी पता चलता है कि तुम जहां भी होतुमको दिखाई नहीं पड़ता है। एक अंधा आदमी पूछता है. प्रकाश क्या हैऔर दर्शन बताना शुरू कर देगा कि प्रकाश क्या है। मगर तंत्र केवल यह निष्पत्ति निकालेगा कि प्रकाश के बारे में प्रश्न पूछने वाला महज आख का अंधा है। और तब तंत्र उस आदमी का उपचार शुरू करेगाउसे बदलने का उपाय करेगा कि उसकी आंखें देख सकें। तंत्र यह नहीं बताएगा कि प्रकाश क्या हैतंत्र सिर्फ यह बताएगा कि तुम किस तरह आख कोदृष्टि कोदेखने को उपलब्ध हो सकते हो। और दृष्टि की उपलब्धि के साथ ही उत्तर उपलब्ध हो जाएगा।
इसलिए तंत्र समाधान नहीं देता हैसमाधान को उपलब्ध होने की विधि देता है। अब यह समाधान बौद्धिक नहीं होगा। अगर तुम अंधे आदमी को प्रकाश के बारे में कुछ कहोगे तो वह कहना बौद्धिक होगा। और अगर अंधा स्वयं देखने में सक्षम हो जाता है तो वह अस्तित्वगत बात होगी। जब मैं कहता हूं कि तंत्र अस्तित्वगत है तो उसका यही मतलब है।
इसलिए शिव देवी के प्रश्नों के उत्तर देने नहीं जा रहे हैंफिर भी देने जा रहे हैं। यह पहली बात। और दूसरी बात कि यह एक सर्वथा भिन्न भाषा है। इसमें प्रवेश के पहले हमें इसके संबंध में कुछ जान लेना होगा। तंत्र के सभी ग्रंथ शिव और देवी के बीच संवाद हैं। देवी पूछती हैं और शिव जवाब देते हैं। सभी तंत्र—ग्रंथ ऐसे ही शुरू होते हैं। क्योंयह ढंग क्यों?
यह बहुत अर्थपूर्ण है। यह संवाद किन्हीं गुरु और शिष्य के बीच संवाद नहीं हैयह संवाद घटित होता है दो प्रेमियों के बीच। और तंत्र इसके द्वारा एक बहुत अर्थपूर्ण बात की खबर देता है. यह कि गहराई की शिक्षा तब तक नहीं दी जा सकतीजब तक कि दोनों केशिष्य और गुरु के बीच प्रेम का संबंध न हो। शिष्य और गुरु को गहरे प्रेमी होना होगा। तब—और तभी—ऊँचाई कोपार को अभिव्यक्त किया जा सकताप्रकट किया जा सकता।
इसलिए यह प्रेम की भाषा है। शिष्य के लिए प्रेम के भाव में होना जरूरी है। लेकिन इतना काफी नहीं है। दो मित्र भी प्रेम में हो सकते हैं। तंत्र कहता हैशिष्य में प्रेम के अतिरिक्त ग्राहकता होनी चाहिए। तभी कुछ संभव है। शिष्य होने के लिए स्त्री होना जरूरी नहीं हैलेकिन उसके लिए स्त्रैण ग्राहकता का भाव अनिवार्य है। यहां देवी पूछती हैंउसका अर्थ हुआ कि स्त्रैण भाव पूछता है। लेकिन स्त्रैण भाव पर यह जोर क्यों?
पुरुष और स्त्री में शारीरिक फर्क ही नहीं हैमानसिक फर्क भी है। यौन शरीर के तल पर ही नहींमन के तल पर भी बड़ा फर्क लाता है। स्त्रैण मन का अर्थ है ग्राहकता—समग्र ग्राहकतासमर्पणप्रेम। शिष्य को उसी स्त्रैण मन की आवश्यकता है,अन्यथा वह नहीं सीख पाएगा। तुम पूछ तो सकते होलेकिन अगर खुले नहीं होतो उत्तर तुमको नहीं मिल सकता। प्रश्न पूछकर भी तुम बंद रह सकते हो। उस हालत में उत्तर तुम में प्रवेश नहीं करेगा। तुम्हारे द्वार—दरवाजे बंद हैंतुम मृत हो। तुम खुले जो नहीं हो।
स्त्रैण ग्राहकता का अर्थ है. गहरे में गर्भ जैसी ग्राहकताताकि तुम ग्रहण कर सकोले सको। उतना ही नहींउससे भी ज्यादा की जरूरत है। स्त्री कोई चीज ग्रहण ही नहीं करती हैजिस क्षण ग्रहण करती है उसी क्षण वह चीज उसके शरीर का भाग बन जाती है। बच्चा ग्रहीत हुआ। स्त्री गर्भ धारण करती है और गर्भाधान के साथ बच्चा स्त्री के शरीर का अंश बन जाता है। वह विजातीय नहीं रहाविदेशी नहीं रहा। वह आत्मसात कर लिया गया। अब वह बच्चा कुछ ऐसा नहीं रहा जो कि मां से जुड़ा भर रहेगाअब वह मां के अंश की तरहमां की तरह ही जीएगा। बच्चा ग्रहीत ही नहीं होता हैस्त्रैण शरीर सृजनात्मक हो जाता है और बच्चा बढ़ने भी लगता है।
शिष्य को गर्भ जैसी ग्राहकता की जरूरत है। जो कुछ भी ग्रहण किया जाएउसे मृत ज्ञान की तरह इकट्ठा नहीं करना हैउसे तुम्हारे भीतर बढ़ना चाहिएउसे तुम्हारा रक्तहड्डी ही बन जाना चाहिए। अब उसे तुम्हारा हिस्सा बन जाना पड़ेगा। उसे बढ़ने देना हैवृद्धि देनी है। और यही वृद्धि तुमकोग्राहक को बदलेगीरूपांतरित करेगी।
यही कारण है कि तंत्र इस उपाय को काम में लाता है। हर ग्रंथ देवी के प्रश्न से शुरू होता है और शिव उसका उत्तर देते हैं। देवी शिव की प्रिया हैं—उनका स्त्रैण अंश।
एक बात और। अब आधुनिक मनोविज्ञानखासकर गहराई का मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य पुरुष और स्त्री दोनों है। कोई भी व्यक्ति न मात्र पुरुष है और न मात्र स्त्री है। प्रत्येक उभयलिंगी हैउसमें दोनों यौन मौजूद हैं। पश्चिम में यह खोज हाल की घटना हैलेकिन तंत्र के लिए हजारों साल से उसकी एक बुनियादी धारणा रही है। तुमने शिव के कुछ चित्र देखे होंगे जिनमें वे अर्धनारीश्वर हैंआधा पुरुष और आधी नारी। मनुष्य के पूरे इतिहास में यह अपनी तरह की अकेली धारणा है। शिव को उसमें आधे पुरुष और आधी स्त्री की तरह चित्रित किया गया है।
इसलिए देवी प्रिया ही नहीं हैंशिव की अर्धांगिनी हैं। और जब तक शिष्य गुरु का दूसरा अर्धांग नहीं बन जाताऊंचाई की शिक्षागुह्य विधियों की शिक्षा नहीं दी जा सकती। जब तुम ऐसे हो जाओगे तो संदेह नहीं बचेगा। जब तुम गुरु के साथ ऐसे एक हो जाओगे—समग्र
रूपेणगहन रूपेणकि छ न रहाबुद्धि न बचीतब तुम ग्रहण करते होतब तुम गर्भ बन जाते हो। और तब गुरु की शिक्षा तुममें वृद्धि पाती हैतुमको बदलने लगती है।
यही कारण है कि तंत्र प्रेम की भाषा में लिखा गया। यहां प्रेम की भाषा के संबंध में भी कुछ समझना आवश्यक है। भाषा दो प्रकार की है : तर्क की भाषा और प्रेम की भाषा। और दोनों में बुनियादी भेद है।
तर्क की भाषा आक्रामकविवादी और हिंसक होती है। अगर मैं तार्किक भाषा का प्रयोग करूं तो मैं तुम्हारे मन पर आक्रमण सा करूंगा। मैं तुमसे अपनी बात मनवाने कीतुमको अपने पक्ष में लाने कीतुम्हें अपना खिलौना बनाने की कोशिश करूंगा। मैं जिद करूंगा कि मेरा तर्क सही है और तुम्हारा गलत। तर्क की भाषा अहं—केंद्रित होती हैइसलिए मैं सिद्ध करूंगा कि मैं सही हूं और तुम गलत। दरअसल मुझे तुमसे कुछ लेना—देना नहीं हैमुझे मेरे अहंकार से मतलब है। और मेरा अहंकार हमेशा सही होता है।
प्रेम की भाषा सर्वथा भिन्न हैवहां मुझे अपनी नहींतुम्हारी चिंता है। वहां मुझे कुछ सिद्ध करने को नहीं पड़ी हैअपने अहंकार को मजबूत नहीं बनाना है। तुम्हारी सहायता करना ही मेरा अभीष्ट है। यह करुणा है जो तुमको बढ़ने मेंबदलने में,तुम्हारे पुनर्जन्म में सहयोगी होना चाहती है।
और दूसरी बात कि तर्क सदा बौद्धिक है। उसमें तर्क और सिद्धात महत्वपूर्ण हैंदलीलें अर्थपूर्ण हैं। प्रेम की भाषा मेंक्या कहा जाएयह महत्व का नहीं हैकैसे कहा जाएमहत्व का है। वाहनशब्द महत्वपूर्ण नहीं हैमहत्वपूर्ण है उसका अर्थउसका संदेश। यह हृदय से हृदय की गुफ्तगू हैमन से मन का वाद—विवाद नहीं। यह विवाद नहीं संवाद हैसहभागिता है। इसलिए यह दुर्लभ घटना है कि पार्वती शिव की गोद में बैठकर पूछती हैं और शिव उत्तर देते हैं। यह प्रेम—संवाद हैप्रेमालाप। इसमें कहीं कोई द्वंद्व नहीं है—शिव मानो स्वयं से बोल रहे हों।
प्रेम परप्रेम की भाषा पर इतना जोर क्यों हैइसलिए कि अगर तुम अपने गुरु के साथ प्रेम में हो तो सारा गेस्टाल्ट बदल जाता हैसमूचा दर्शनसमूचा परिदृश्य दूसरा ही हो जाता है। तब बात ही कुछ और है। तब तुम गुरु के शब्द नहीं सुनते होतब तुम गुरु को पीते हो। तब शब्द अप्रासंगिक हो जाते हैंतब शब्दों के बीच का मौन महिमावान हो उठता है। गुरु जो कुछ कहता हैवह अर्थपूर्ण हो सकता हैनहीं भी हो सकता हैउसमें असली चीज उसकी दृष्टि हैमुद्रा हैअसली चीज उसकी करुणा हैप्रेम है।
इसीलिए तंत्र की एक निश्चित अवस्था हैढंग है। उसका हरेक ग्रंथ देवी के प्रश्न और शिव के उत्तर से शुरू होता है। दलील के लिए उसमें जगह नहीं हैशब्दों का वहां अपव्यय नहीं है। उसमें तथ्यों के सीधे—सादे वक्तव्य हैं जो तारनुमा भाषा में,संक्षिप्ततम रूप में कहे गए हैं। उसमें किसी से मनवाने का आग्रह नहीं हैमात्र बताने की बात है।
अगर तुम बंद मन से शिव को प्रश्न पूछो तो वे इस ढंग से जवाब नहीं देंगे। तब पहले तुम्हारा जो बंद होना हैउसे हटाने के लिए शिव को आक्रामक होना पड़ेगा। तब पहले तुम्हारे पूर्वाग्रहों कोपूर्व—धारणाओं को नष्ट करना पड़ेगा। जब तक तुम अपने अतीत से बिलकुल विच्छिन्न नहीं होतेतब तक तुमको कुछ भी नहीं दिया जा सकता। लेकिन शिव की प्रिया के साथदेवी के साथ यह बात नहीं हैदेवी के साथ देवी का कोई अतीत नहीं है।
स्मरण रहे कि जब तुम गहरे प्रेम में होते होतब तुम्हारा मन विसर्जित हो जाता हैनहीं हो जाता है। तब कोई अतीत नहीं रहता हैवर्तमान का क्षण ही सब कुछ हो जाता है। जब तुम प्रेम में होते होतब वर्तमान ही मात्र समय होता है। वर्तमान ही सब कुछ है—न अतीतन भविष्य।
इसलिए देवी खुली हैं। कोई सुरक्षा नहीं है वहांकुछ साफ करने को नहीं हैकुछ नष्ट करने को नहीं है। भूमि तैयार है,उसमें बीज डालने की देर है। कहना चाहिए कि भूमि न केवल तैयार ही हैवह स्वागत की मुद्रा में हैग्राहक हैवह गर्भ बनने को तत्पर है।
इसलिए शिव के ये वचनजिन पर हम चर्चा करेंगेअति संक्षिप्त हैंसूत्ररूप में हैं। लेकिन शिव का प्रत्येक सूत्र एक वेद कीएक बाइबिल कीएक कुरान की हैसियत का है। उनका एक अकेला वाक्य एक महान शास्त्र काधर्म—ग्रंथ का आधार बन सकता है। शास्त्र तर्कबद्ध होते हैंउनमें प्रस्ताव करना पड़ता हैबचाव करना पड़ता हैतर्क देना पड़ता है। यहां कोई तर्क नहीं है,प्रेम का मात्र वक्तव्य दिया गया है।
तीसरी बात कि विज्ञान भैरव तंत्र का अर्थ ही है चेतना के भी पार जाने की विधि। विज्ञान का अर्थ चेतना हैभैरव का अर्थ वह अवस्था है जो चेतना से भी परे है और तंत्र का अर्थ विधि हैचेतना के पार जाने की विधि। यह परम धर्म—सिद्धांत है—सिद्धांत के बिना धर्म—सिद्धांत।
हम मूर्च्‍छित हैंअचेतन हैंइसलिए सारी धर्म—देशना अचेतन के ऊपर उठने कीचेतन होने की देशना है। उदाहरण के लिए कृष्णमूर्ति हैंझेन हैवे सभी अधिक से अधिक चेतनासजगताहोश लाने की फिक्र करते हैं। क्योंकि हम मूर्च्छित हैं,बेहोश हैंइसलिए कैसे ज्यादा होशपूर्णज्यादा जाग्रत हुआ जाएमूर्च्छा से जागरण की ओर कैसे गति हो?
लेकिन तंत्र कहता है कि यह भी द्वैत का ही खेल है—यह मूर्च्छा— अमूर्च्छा का खेल है। यदि तुम मूर्च्छा से अमूर्च्छा की यात्रा करते हो तो भी एक द्वैत की ही यात्रा करते हो। तंत्र कहता है. दोनों के पार चलो। जब तक तुम दोनों के पार नहीं जाते,तब तक परम को नहीं उपलब्ध हो सकते। इसलिए न अचेतनन चेतनदोनों के पार चलोमात्र होओ। चेतन—अचेतन नहीं होना हैमात्र होना है। यह योग के भी पार हैझेन के भी पार हैयह सभी धर्म—देशनाओं के पार है।
विज्ञान कामतलब चेतना है। और भैरव एक विशेष शब्द हैतांत्रिक शब्दजो पारगामी कै लिए कहां गया है। इसलिए शिव को भैरव कहते हैं और देवी को भैरवी—वे जो समस्त द्वैत के पार चले गए हैं।
हमारे अनुभव में प्रेम ही उसकी थोड़ी झलक दे सकता है। यही कारण है कि तंत्र—विद्या सिखाने के लिए प्रेम उसका बुनियादी उपाय बन जाता है। अपने अनुभव से हम कह सकते हैं कि प्रेम ही वह कुछ है जो द्वैत के पार जाता है। जब दो व्यक्ति प्रेम में होते हैंतब ज्यों—ज्यों वे उसकी गहराई में उतरते हैं त्यों—त्यों दो कम और एक ही ज्यादा रहते हैं। और एक बिंदु आता हैएक शिखर स्पर्श होता है जहां वे देखने में ही दो होते हैंभीतर एक ही हो जाते हैं। वहां द्वैत का अतिक्रमण हो जाता हैं।
 इसी अर्थ में जीसस का यह वचन कि 'परमात्मा प्रेम हैअर्थपूर्ण हो जाता हैअन्यथा नहीं। हमारे अनुभव में प्रेम परमात्मा के सबसे निकट है। इसका यह मतलब नहीं है जैसा कि ईसाई अर्थ किए चले जाते हैं कि परमात्मा प्रेमपूर्ण है कि परमात्मा को आपके लिए पिता जैसा प्रेम है। ये मूर्खता भरी बातें हैं। परमात्मा प्रेम है—यह एक तांत्रिक वक्तव्य है। इसका अर्थ है कि हमारे अनुभव में केवल प्रेम वह यथार्थ है जो परमात्मा केभगवत्ता के निकटतम पड़ता है। क्योंकि प्रेम में एकता का अनुभव होता है। शरीर दो रहते हैंलेकिन शरीर से परे कुछ है जो मिलकर एके हो जाता है।
यही कारण है कि यौन की भूख इतनी बड़ी हैउसकी दौड़ भारी है। असली दौड़ तो इस एकता के पीछे है। लेकिन वह एकता यौन कीकाम की नहीं है। काम में दो शरीरों को एक होने का धोखा ही होता हैवे एक होते नहीं। वे आलिंगन में बंधते हैं और एक क्षण के लिए दोनों एक—दूसरे में अपने को भूल जाते हैंऔर थोड़ी शारीरिक एकता अनुभव होती है। यह खोज बुरी नहीं हैलेकिन उस पर ही रुक जाना खतरनाक है। यह खोज किसी गहरी एकता की खोज की खबर भर है।
प्रेम में किसी ऊंचे तल पर कुछ आंतरिक गति करता है और एक—दूसरे में मिलकर एकता की अनुभूति होती है। उसमें द्वैत मिट जाता है। और इसी द्वैतहीन प्रेम में हमें उसकी झलक मिल सकती है जिसे भैरव की अवस्था कहते हैं। हम कह सकते हैं कि भैरवावस्था वह प्रेम है जिसमें से लौटना नहीं होता है। प्रेम के शिखर से फिर नीचे आना नहीं हैशिखर पर ही बने रहना है।
हमने कैलाश पर शिव का आवास बनाया है। वह प्रतीक है कि कैलाश सबसे ऊंचा शिखर हैसबसे पवित्र शिखर है। वहीं हमने शिव का आवास रखा है। हम वहां जा सकते हैंलेकिन हमें वहा से नीचे उतर आना होगा। वह हमारा आवास नहीं हो सकता है। हम तीर्थयात्रा के लिए वहा जा सकते हैं। वह तीर्थ हैतीर्थयात्रा है। एक क्षण के लिए हम भी उस शिखर को छू सकते हैंलेकिन फिर वापस आना होगा।
प्रेम में यह पवित्र तीर्थयात्रा घटित होती हैलेकिन सब के लिए नहीं। क्योंकि शायद ही कोई यौन के पार जाता है। इसलिए हम घाटी मेंअंधेरी घाटी में जीते चले जाते हैं। कभी—कभी विरला कोई प्रेम के शिखर को उपलब्ध होता हैलेकिन वह भी नीचे उतर आता हैक्योंकि उस ऊंचाई पर सिर चकराने लगता है। वह इतना ऊंचा है और तुम इतने निम्नछोटे। और वहा रहना भी कठिन है। जिन्होंने प्रेम किया हैवे जानते हैं कि प्रेम में सदा बने रहना कितना कठिन है। बार—बार वापस आना पड़ता है। वह शिव का आवास है। वे वहां रहते हैंवह उनका घर ही है।
भैरव प्रेम में जीते हैंप्रेम उनका आवास है। जब मैं कहता हूं कि वह उनका आवास हैउसका अर्थ है कि अब उन्हें प्रेम का भी बोध नहीं रहा। क्योंकि कैलाश पर ही रहने पर बोध भी जाता रहता है कि यह कैलाश हैशिखर है। तब शिखर समतल भूमि बन जाता है। शिव को प्रेम का बोध नहीं है। हमें प्रेम का बोध होता हैक्योंकि हम अप्रेम में जीते हैंऔर इस वैषम्य के कारणविपरीतता के कारण हमें प्रेम का बोध होता है।
शिव प्रेम ही हैं। भैरव का अर्थ होता है कि वह प्रेम ही हो गया है। यह नहीं कि वह प्रेमपूर्ण है, प्रेम करतावह स्वय हो गया हैवह शिखर पर हैशिखर ही उसका आवास है।
इस सर्वोच्च शिखर को संभव कैसे बनाया जाए जो सब द्वैत के पार हैअचेतन के पार हैचेतन के पार हैशरीर और आत्मा के पार हैसंसार और मोक्ष के भी पार हैइस शिखर को उपलब्ध कैसे हुआ जाए?
उसकी विधि तंत्र है। लेकिन तंत्र शुद्ध विधि हैइसलिए इसे समझने में कठिनाई होगी। इसलिए हम पहले उस प्रश्न को समझें जो देवी पूछती हैं।
हे शिव आपका सत्य क्या है?
यह प्रश्न क्योंतुम भी यही प्रश्न पूछ सकते होलेकिन उसका वही अर्थ नहीं होगा। इसलिए समझने की कोशिश करो कि देवी क्यों पूछती हैं कि आपका सत्य क्या है।
देवी गहरे से गहरे प्रेम में हैं। और जब कोई गहरे प्रेम में होता है तब पहली दफा उसे भीतर सत्य का साक्षात्कार होता है। तब शिव आकार नहीं हैंशरीर नहीं हैं। जब तुम प्रेम में होते होतब प्रेमी का शरीर लुप्त हो जाता है। तब आकार मिट जाता हैनिराकार प्रकट होता है। तब तुम एक अतल गहराई के सामने होते हो। यही कारण है कि हम प्रेम से इतना डरते हैं। हम एक शरीर का सामना कर सकते हैंहम आकृति कारूप का सामना कर सकते हैंलेकिन हम अगाध अतल कामहाशून्य का सामना नहीं कर सकते।
अगर तुम किसी को प्रेम करते होसचमुच प्रेम करते हो तो उसका शरीर निश्चित रूप से विलुप्त हो जाने वाला है। ऊंचाई के शिखर के किसी क्षण में आकार मिट जाएगा और प्रेमी के माध्यम से तुम निराकार में प्रवेश कर जाओगे। यही वजह है कि हम डरते हैं। यह तो एक अतल समुद्र में गिरना हो जाएगा।
'हे शिवआपका सत्य क्या है?'
यह महज जिज्ञासा का प्रश्न नहीं है। देवी अवश्य ही आकार के साथ प्रेम में पड़ गई होंगी। चीजें वैसे ही शुरू होती हैं। उन्होंने पहले आदमी के रूप में इस आदमी को प्रेम किया होगा। और जब प्रेम वयस्क हुआप्रस्फुटित हुआखिलातब यह आदमी ही अंतर्धान हो गया। वह निराकार हो गया है। अब वह आदमी कहीं दिखाई नहीं देता।
'हे शिवआपका सत्य क्या है?'
यह प्रेम के एक अत्यंत ही गहन क्षण में पूछा गया प्रश्न है। और जब प्रश्न उठते हैं तब जिन मनों से वे उठते हैं उनके अनुसार उनमें फर्क पड़ता है। इसलिए अपने—अपने मन में इस प्रश्न की स्थितिइसका माहौल पैदा करो। पार्वती भारी अड़चन में पड़ी होंगीदेवी कठिनाई में पड़ी होंगी। शिव अंतर्धान हो गए हैं। जब प्रेम अपने शिखर पर होता हैतब प्रेमी अंतर्धान हो जाता है। यह क्यों होता है?
यह होता हैक्योंकि वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति निराकार है। तुम शरीर नहीं हो। शरीर की तरह चलते होशरीर के तल पर जीते होलेकिन शरीर नहीं हो। जब हम बाहर से किसी को देखते हैं तब वह शरीर ही है। लेकिन प्रेम तो भीतर प्रवेश करता है। तब हम व्यक्ति को बाहर से नहीं देखते हैं। प्रेम किसी को भी वैसे देख सकता है जैसे वह अपने को भीतर से देखता है। तब रूप विदा हो जाता है।
झेन संत रिंझाई आत्मोपलब्ध हुआ तो उसने पहला प्रश्न पूछा : मेरा शरीर कहां हैवह कहां चला गयाऔर वह खोजने लगा। उसने अपने शिष्यों को बुलाया और कहां : जाओ और खोजो कि मेरा शरीर कहां गयामेरा शरीर खो गया है।
वह निराकार मेंअरूप में प्रवेश कर गया था। तुम भी एक निराकार अस्तित्व हो। लेकिन तुम अपने को प्रत्यक्ष नहीं,दूसरों की वजह से जानते हो। तुम अपने को आईने के मार्फत जानते हो। किसी समय आईने में अपने को देखते हुए आंखें  बंद कर लो और तब ध्यान करो अगर आईना नहीं होता तो मैं अपना रूप कैसे पहचानताएक ऐसी दुनिया की सोचो जहां आईना नहीं हो। तुम अकेले होकोई आईना नहीं हैआईने का काम करती हुई दूसरों की आंखें भी नहीं हैं। तब क्या तुम्हें चेहरा होगा?या तुम्हें शरीर होगा?
नहींनहीं होगा। है भी नहीं। हम अपने को दूसरों के द्वारा ही जानते हैं। और दूसरे केवल बाहरी रूप देखते हैं। और यही कारण है कि हम उसके साथ तादात्म्य कर लेते हैं।
एक दूसरा झेन संत हयाकुजो अपने शिष्यों से कहां करता था. जब ध्यान करते हुए तुम्हारा सिर खो जाए तब तुरंत मेरे पास आना। जब तुम्हें लगे कि तुम्हारा सिर तुम्हारे कंधे पर नहीं है तब डरना मततुरंत मेरे पास चले आना। यही सही क्षण है,जब तुम्हें कुछ सिखाया जा सकता है। सिर के रहते सिखावन संभव नहीं है। सिर सदा बीच में आ जाता है।
देवी शिव से पूछती हैं. 'हे शिवआपका सत्य क्या हैआप कौन हैं?'
आकार मिट गया हैइसलिए यह प्रश्न। प्रेम में तुम दूसरे में स्वयं उसकी तरह प्रविष्ट होते हो। तुम उत्तर नहीं दे रहेतुम एक हो जाते हो। और पहली दफा तुम एक अंतस कोनिराकार उपस्थिति को जानते हो।
यही कारण है कि सदियों—सदियों तक हमने शिव की कोई प्रतिमाकोई चित्र नहीं बनाया। हम सिर्फ शिवलिंग बनाते रहे,उनका प्रतीक बनाते रहे। शिवलिंग एक निराकार आकार है। जब तुम किसी को प्रेम करते होकिसी में प्रवेश करते होतब वह मात्र एक ज्योतित उपस्थिति हो जाता है। शिवलिंग वही ज्योतित उपस्थिति हैप्रकाश का प्रभा—मंडल। इसीलिए देवी पूछती हैं :
आपका सत्य क्या हैयह विस्मय—भरा विश्व क्या है?
हम विश्व को जानते हैंलेकिन नहीं जानते हैं कि यह आश्चर्य से भरा है। बच्चे जानते हैंप्रेमी जानते हैंकभी—कभी कवि और पागल जानते हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि ब्रह्मांड आश्चर्य भरा है। हमारे लिए सब कुछ महज पुनरावृत्ति हैउसमें कोई आश्चर्य नहींकोई कविता नहीं। वह सपाट गद्य है हमारे लिए। तुम्हारे हृदय में वह कोई गीत नहीं पैदा करतातुममें वह नृत्य नहीं उपजातातुम्हारे भीतर किसी कविता का जन्म नहीं बनता। सारा जगत यंत्रवत मालूम होता है।
बच्चे अवश्य उसे आश्चर्य— भरी आंखों से देखते हैं। और जब आंखें  आश्चर्य— भरी होती हैंतब सारा ब्रह्मांड आश्चर्य से भर जाता है। और जब तुम प्रेम में होते होतुम फिर बच्चों की भांति हो जाते हो। जीसस कहते हैं : केवल वे ही हमारे प्रभु के राज्य में प्रवेश करेंगे जो बच्चों की भांति हैं। क्योंक्योंकि विश्व यदि आश्चर्यपूर्ण नहीं है तो तुम धार्मिक नहीं हो सकते। विश्व की व्याख्या हो सकेयह दृष्टि वैज्ञानिक है। तब जगत ज्ञात है या अज्ञात। लेकिन जो अज्ञातवह किसी दिन ज्ञात सकता। तब वह अज्ञय नहीं है। और जगत तभी अज्ञेय हैएक रहस्य हैजब आंखें  विस्मय— भरी हों।
देवी पूछती हैं : 'यह विस्मय—भरा विश्व क्या है?'
यहां वे व्यक्तिगत प्रश्न से अचानक अव्यक्तिगत प्रश्न पर छलांग लगाती हैं। वे पूछती थीं : आपका सत्य क्या हैऔर फिर अचानक पूछ बैठती हैं : यह विस्मय— भरा जगत क्या हैजब रूप विदा होता है तब प्रेमी विश्व बन जाता है—निराकार,अंतहीन। अचानक देवी को बोध होता है कि मैं शिव के बारे में नहीं पूछ रही हूं पूरे विश्व के बारे में पूछ रही हूं। अब शिव ही समस्त विश्व हो गए हैं। अब सब ग्रह—तारे उनके भीतर ही घूम रहे हैंसारा आकाशसमस्त महाकाश उनसे घिरा है। अब वे सब से बड़ा घेरने वाला तत्व हैं—महा घेरनहार।
कार्ल जैस्पर्स ने ईश्वर को महा घेरनहार कहां है। जब तुम प्रेम मेंप्रेम के घनिष्ठ सस्वर में प्रवेश करते होतब व्यक्ति का,रूप का लोप हो जाता है और प्रेमी विश्व का द्वार बनकर रह जाता है।
अगर तुम्हारी उत्सुकता वैज्ञानिक है तो तुम्हें तर्क की राह से जाना होगा। तब तुम्हें निराकार की नहीं सोचना चाहिए। तब निराकार से बचो और आकार से संतोष करो। इसलिए विज्ञान सदा रूप से बंधा है। यदि वैज्ञानिक मन को कुछ निराकार की बात कही जाए तो वह तुरंत उसे आकार में तोड़कर रख देगा। जब तक वह आकार नहीं धारण करतावह उसके लिए व्यर्थ है। पहले उसे आकारनिश्चित आकार देना है और तब खोज शुरू होगी।
प्रेम में यदि आकार हो तो उसका अंत है। आकार को मिटा दो। जब चीजें अरूप हो जाती हैं—धुंधलकीसीमाहीन हो जाती हैंजब हर चीज दूसरी चीज में प्रवेश करती हैजब समस्त विश्व एकता में सिमट जाता हैतब—और तभी—यह विश्व विस्मय— भरा कलामय विश्व है।
इसका बीज क्या है?
देवी आगे बढ़ती हैंविश्व से भी आगे जाकर पूछती हैं. इसका बीज क्या हैयह निराकारविस्मय— भरा विश्व कहां से आता हैकहां इसका उद्गम हैया क्या कोई उद्गम नहीं हैबीज क्या है?
विश्व— चक्र की धुरी क्या है?
देवी आगे पूछती हैं। यह चक्र चलता ही जाता है—महापरिवर्तनसतत प्रवाह। लेकिन इसका मध्यबिंदु क्या हैइसकी धुरी कहां हैअचल केंद्र कहां है?
देवी किसी उत्तर के लिए नहीं रुकती हैंपूछती ही चली जाती हैं। मानो वे किसी और से नहींस्वयं से ही बात कर रही हों।
रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे यह जीवन क्या हैदेश और काल नाम और प्रत्यय के परे जाकर हम इसमें कैसे पूर्णत: प्रवेश करेंमेरे संशय निर्मूल करें।
यहां प्रश्न से अधिक संशय पर जोर है. मेरे संशय निर्मूल करें।
यह महत्वपूर्ण है। अगर तुम कोई बौद्धिक प्रश्न पूछते हो तो तुम उसके हल के लिए निश्चित उत्तर चाहते हो। लेकिन देवी कहती हैं : 'मेरे संशय निर्मूल करें। 'वे वास्तव में कोई उत्तर नहीं चाहतींअपने मन का रूपांतरण चाहती हैं। क्योंकि जो उत्तर भी दिया जाएसंदेह तंत्र में प्रवेश करने वाला मन संदेह ही करता रहेगा।
इसे ध्यान में रख लो संदेह करने वाला मन संदेह ही करता रहेगा। उत्तर अप्रासंगिक है। मैं एक उत्तर दूं लेकिन अगर तुम्हारा मन संदेह करने वाला है तो तुम उस उत्तर पर भी संदेह करोगे। तुम्हारा मन ही संदेह करने वाला है। और संदेह से भरे मन का अर्थ है कि तुम किसी भी चीज पर प्रश्नचिह्न लगा दोगे।
इसलिए उत्तर व्यर्थ हैं। तुम मुझसे पूछते हो : किसने संसार को बनायाऔर यदि मैं कहूं कि अ ने बनाया तो तुम निश्चित रूप से पूछोगे कि अ को किसने बनायाइसलिए असली समस्या प्रश्नों के उत्तर देना नहीं हैअसली समस्या है कि संदेह करने वाले मन को कैसे बदला जाएउसे कैसे ऐसा बनाया जाए कि वह संदेह न करेश्रद्धा करे।
इसलिए देवी कहती हैं 'मेरे संशय निर्मूल करें। '
दो—तीन बातें और। जब तुम प्रश्न पूछते हो तो कई कारण से पूछ सकते हो। एक कारण हो सकता है कि तुम अपनी संपुष्टि के लिए पूछते हो। तुम्हें उत्तर पता हैउत्तर तुम्हारे पास हैतुम सिर्फ पक्का करना चाहते हो कि तुम्हारा उत्तर सही है। लेकिन तब तुम्हारा प्रश्न ही झूठा हैनकली है। वह प्रश्न ही नहीं है। तुम अपने को बदलने के इरादे से नहींसिर्फ कुतूहलवश पूछते हो।
मन पूछता ही जाता है। मन में प्रश्न वैसे ही आते हैं जैसे पेडू में पत्ते लगते हैं। मन का स्वभाव ही है पूछना। वह पूछता ही चला जाता है। तुम क्या पूछते होयह महत्व का नहीं हैमन को जो भी मिलेवह उससे ही प्रश्न पैदा कर लेगा। मन प्रश्न गढ़ने की चक्की है। मन को कुछ भी दे दोवह उसके टुकडे कर उससे अनेक प्रश्न बना लेगा। तुम एक प्रश्न का उत्तर दोवह उसी एक उत्तर से अनेक प्रश्न गढ़ लेगा।
यही तो दर्शन का इतिहास रहा है। बर्ट्रेड रसेल ने अपने संस्मरण में कहां है कि मैं बच्चा था तो सोचता था कि एक दिन जब सारे दर्शन को समझने की प्रौढ़ता आएगी तब सभी प्रश्न हल हो जाएंगे। अब जब अस्सी का हो चुका हूं तो मैं कह सकता हूं कि मेरे बचपन के प्रश्न तो त्यों के त्यों खड़े ही हैंदर्शन के इन सिद्धांतों के कारण बहुत—से दूसरे प्रश्न भी पैदा हो गए हैं। इसलिए रसेल ने कहां कि मैं युवा था तो कहता था कि दर्शन आत्यंतिक उत्तरों की खोज हैअब यह नहीं कह सकता। इसे तो अंतहीन प्रश्नों की खोज ही कहना उचित होगा। इसलिए एक प्रश्न अपने साथ एक उत्तर लाता है और साथ ही अनेक प्रश्न भी। संदेह करने वाला मन ही समस्या है।
पार्वती कहती हैं : मेरे प्रश्नों की फिक्र न करें। मैंने अनेक प्रश्न पूछ लिए. 'आपका सत्य रूप क्या हैयह आश्चर्य — भरा जगत क्या हैबीज कौन हैजागतिक चक्र की धुरी कहां हैआकार के परे जीवन क्या हैसमय और स्थान से परे होकर हम उसमें पूरी तरह प्रवेश कैसे करेंलेकिन मेरे प्रश्नों की फिक्र न करें। मेरे संशय निर्मूल करें। ये प्रश्न तो मैं इसलिए पूछती हूं कि वे मेरे मन में उठते हैं। मैं आपको केवल अपना मन दिखाने के लिए ये प्रश्न पूछती हूं। उन पर बहुत ध्यान मत दें। उत्तरों से मेरा काम नहीं चलेगा। मेरी जरूरत तो है कि मेरे संशय निर्मूल हों।
लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगेकिसी उत्तर सेक्या कोई उत्तर है जो कि मन के संशय दूर कर देमन ही तो संशय है। जब तक मन नहीं मिटता हैसंशय निर्मूल कैसे होंगे?
शिव उत्तर देंगे। उनके उत्तर में सिर्फ विधियां हैं—सबसे पुरानीसबसे प्राचीन विधियां। लेकिन तुम उन्हें अत्याधुनिक भी कह सकते होक्योंकि उनमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता। वे पूर्ण हैं—एक सौ बारह विधियां। उनमें सभी संभावनाओं का समावेश हैमन को शुद्ध करने केमन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाए हैं। शिव की एक सौ बारह विधियों में एक और विधि नहीं जोड़ी जा सकती। और यह ग्रंथविज्ञान भैरव तंत्रपांच हजार वर्ष पुराना है। उसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकताकुछ जोड्ने की गुंजाइश ही नहीं है। यह सर्वांगीण हैसंपूर्ण हैअंतिम है। यह सब से प्राचीन है और साथ ही सबसे आधुनिकसबसे नवीन। पुराने पर्वतों की भांति ये तंत्र पुराने हैंशाश्वत जैसे लगते हैंऔर साथ ही सुबह के सूरज के सामने खड़े ओस—कण की भाति ये नए हैंये इतने ताजे हैं।
ध्यान की इन एक सौ बारह विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है। एक—एक कर हम उनमें प्रवेश करेंगे। पहले हम उन्हें बुद्धि से समझने की चेष्टा करेंगे। लेकिन बुद्धि को मात्र एक यंत्र की तरह काम में लाओमालिक की तरह नहीं। समझने के लिए यंत्र की तरह उसका उपयोग करोलेकिन उसके जरिए नए व्यवधान मत पैदा करो। जिस समय हम इन विधियों की चर्चा करेंगेतुम अपने पुराने ज्ञान कोपुरानी जानकारियों को .एक किनारे धर देना। उन्हें अलग ही कर देनावे रास्ते की धूल भर हैं।
इन विधियों का साक्षात्कार निश्चय ही सावचेत मन से करोलेकिन तर्क को हटा कर करो। इस भ्रम में मत रहो कि विवाद करने वाला मन सावचेत मन है। वह नहीं है। क्योंकि जिस क्षण तुम विवाद में उतरते होउसी क्षण सजगता खो देते हो,सावचेत नहीं रहते हो। तुम तब यहां हो ही नहीं।
ये विधियां किसी धर्म की नहीं हैं। याद रखोवे ठीक वैसे ही हिंदू नहीं हैं जैसे सापेक्षवाद का सिद्धांत आइंस्टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जातारेडियो और टेलीविजन ईसाई नहीं हैं। कोई नहीं कहता कि बिजली ईसाई है,क्योंकि ईसाई मस्तिष्क ने उसका आविष्कार किया था। विज्ञान किसी वर्ण या धर्म का नहीं है। और तंत्र विज्ञान है। इसलिए स्मरण रहे कि तंत्र हिंदू कतई नहीं है। ये विधियां हिंदुओं की ईजाद अवश्य हैंलेकिन वे स्वयं हिंदू नहीं हैं। इसलिए इन विधियों में किसी धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख नहीं रहेगा। किसी मंदिर की जरूरत नहीं है। तुम स्वयं मंदिर हो। तुम ही प्रयोगशाला हो,तुम्हारे भीतर ही पूरा प्रयोग होने वाला है। और विश्वास की भी जरूरत नहीं है।
तंत्र धर्म नहींविज्ञान हैकिसी विश्वास की जरूरत नहीं है। कुरान या वेद मेंबुद्ध या महावीर में आस्था रखने की आवश्यकता नहीं है। नहींकिसी विश्वास की आवश्यकता नहीं है। प्रयोग करने का महासाहस पर्याप्त हैप्रयोग करने की हिम्मत काफी है और यही इसका सौंदर्य है। एक मुसलमान प्रयोग कर सकता है और वह कुरान के गहरे अर्थों को उपलब्ध हो जाएगा। एक हिंदू अभ्यास कर सकता है और वह पहली दफा जानेगा कि वेद क्या है। वैसे ही एक जैन इस साधना में उतर सकता है,बौद्ध इस साधना में उतर सकता है। उन्हें अपने धर्म छोड़ने की जरूरत नहीं है। वे जहां हैं वहीं तंत्र उन्हें आप्तकाम करेगा। उनके अपने चुने हुए रास्ते जो भी होंतंत्र सहयोगी होगा।
इसलिए याद रहेतंत्र शुद्ध विज्ञान है। तुम हिंदू हो सकते होया मुसलमानया पारसीया कोई भी। तंत्र तुम्हारे धर्म को जरा भी नहीं छूता है। तंत्र का कहना है कि धर्म सामाजिक मामला है। किसी भी धर्म में रहोयह अप्रासंगिक है। लेकिन तुम अपने को रूपांतरित कर सकते हो। और उस रूपांतरण के लिए वैज्ञानिक प्रणाली जरूरी है'। जब तुम बीमार पड़ते हो या तुम्हें तपेदिक या कुछ हो गया हैतब तुम्हारा हिंदू या मुसलमान होना कोई फर्क नहीं करता है। तपेदिक को तुम्हारे हिंदू इस्लाम या किसी भी राजनीतिक या सामाजिक विश्वास के साथ लेना—देना नहीं है। तपेदिक का इलाज वैज्ञानिक ढंग से किया जाना होगा। कोई हिंदू तपेदिक या मुसलमान तपेदिक नहीं होता।
तुम अज्ञान में होद्वंद्व में होतुम सोए हो। यह एक रोग है—आध्यात्मिक रोग। और इस रोग का इलाज तंत्र के द्वारा होना है। तुम इसमें अप्रासंगिक होतुम्हारा विश्वास अप्रासंगिक है। यह आकस्मिक है कि तुम कहीं पैदा हुए हो और कोई दूसरा और कहीं पैदा हुआ है। यह सांयोगिक है। तुम्हारा धर्म भी सांयोगिक है। इसलिए उससे चिपके मत रहो। और अपने को रूपांतरित करने के लिए वैज्ञानिक प्रणाली का उपयोग करो।
तंत्र बहुत माना—जाना नहीं है। यदि माना—जाना भी है तो बहुत गलत समझा गया है। और उसके कारण हैं। जो विज्ञान जितना ही ऊंचा और शुद्ध होगाउतना ही कम जनसाधारण उसे जान—समझ सकेगा। हमने सापेक्षवाद के सिद्धांत का नाम सुना है। कहां जाता था कि आइंस्टीन के जीते—जी केवल बारह व्यक्ति उसे समझते थे। सारी जमीन पर सिर्फ बारह लोग उसे समझ सके। खुद अल्वर्ट आइंस्टीन के लिए उसे दूसरों को समझानाउसे समझने के योग्य बनाना कठिन था। क्योंकि वह सिद्धांत ही इतना ऊंचा था। मानो वह तुम्हारे सिर के ऊपर से चला जला था।
लेकिन उसे समझा जा सकता है। एक तकनीकी ज्ञान होगणित का ज्ञान होप्रशिक्षण होतो वह बिलकुल समझा जा सकता है। तंत्र उससे भी कठिन हैक्योंकि किसी प्रशिक्षण से काम नहीं चलेगा। केवल रूपांतरण मदद कर सकता है।
यही कारण है कि जनसाधारण के लिए तंत्र नहीं समझा गया। और सदा यह होता है कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो तो उसे गलत जरूर समझते होक्योंकि तब तुम्हें लगता है कि समझते जरूर हो। तुम रिक्त स्थान में बने रहने को राजी नहीं हो।
दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते होतुम उसे गाली देने लगते हो। यह इसलिए कि यह तुम्हें अपमानजनक लगता है। तुम सोचते होमैं और नहीं समझूं यह असंभव है। इस चीज के साथ ही कुछ भूल होगी। और तब तुम गाली देने लगते हो। तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो। और कहते हो कि अब ठीक है।
इसलिए तंत्र को नहीं समझा गयाऔर तंत्र को गलत समझा गया। वह इतना गहरा और ऊंचा था कि यह होना स्वाभाविक था।
तीसरी बात कि चूंकि तंत्र द्वैत के पार जाता है इसलिए उसका दृष्टिकोण अति नैतिक है। कृपा कर इन शब्दों को समझो. नैतिकअनैतिकअति नैतिक। नैतिक क्याहम समझते हैंअनैतिक क्या हैवह भी हम समझते हैं। लेकिन जब कोई चीज अति नैतिक हो जाती हैनैतिक— अनैतिक दोनों के पार चली जाती हैतब उसे समझना कठिन हो जाता है।
तंत्र अति नैतिक है। इसे इस तरह देखो। औषधिदवा अति नैतिक हैवह न नैतिक है और न अनैतिक। चोर को दवा दो तो उसे लाभ पहुंचाएगी। संत को दोतो उसे भी लाभ पहुंचाएगी। वह चोर और संत में कोई भेद नहीं करेगी। दवा नहीं कह सकती कि यह चोर है इसलिए मैं उसे मारूंगी और वह साधुहै उसकी मदद करूंगी। दवा वैज्ञानिक है। तुम्हारा चोर या संत होना उसके लिए अप्रासंगिक हैं।
तंत्र अति नैतिक है। तंत्र कहता है : कोई नैतिकता जरूरी नहीं हैकोई खास नैतिकता जरूरी नहीं है। सच तो यह है कि तुम अनैतिक होक्योंकि तुम्हारा चित्त अशात है। इसलिए तंत्र शर्त नहीं लगाता कि पहले तुम नैतिक बनो तब तंत्र की साधना कर सकते हो। तंत्र के लिए यह बात ही बेतुकी है। कोई बीमार हैबुखार में है और डाक्टर आकर कहता है : पहले अपना बुखार कम करोपहले पूरा स्वस्थ हो लो और तभी मैं दवा दूंगा!
यही तो हो रहा है। एक चोर साधु के पास आता है और कहता है कि मैं चोर हूं मुझे ध्यान करना सिखाएं। साधु कहता है कि पहले चोरी छोड़ोचोर रहते ध्यान कैसे करोगे! एक शराबी आकर कहता हैमैं शराबी हूं मुझे ध्यान बताएं। और साधु कहता हैपहली शर्त कि शराब छोड़ो और तब ध्यान कर सकोगे।
ये शर्तें ही आत्मघातक हो जाती हैं। वह मनुष्य शराबी हैया चोर हैया अनैतिक हैक्योंकि उसका चित्त अशांत हैरुग्ण है। ये तो रुग्ण चित्त के प्रभाव हैंपरिणाम हैं। और उसे कहां जाता हैपहले अच्छे हो लो तब ध्यान करना। लेकिन तब ध्यान की जरूरत किसको हैध्यान औषधीय हैध्यान औषधि है।
तंत्र अति नैतिक है। वह नहीं पूछता कि तुम कौन हो। तुम्हारा मनुष्य होना काफी है। तुम जहां भी होजो भी हो,स्वीकृत हो।
जो विधि तुम्हें तुम्हारे अनुकूल पड़े उसे चुन लोउसमें अपनी पूरी शक्ति लगा दोऔर फिर तुम वही नहीं रहोगे जो थे। वास्तविकप्रामाणिक विधियां सदा वैसा ही करती हैं। और मैं पूर्व—शर्त खड़ी करता हूं तो वह बताता है कि विधि नकली है। अगर मैं कहूं कि पहले यह करोवह मत करो और तब ध्यानतो उसका अर्थ हुआ कि मैं असंभव शर्तें रख रहा हूं। क्योंकि चोर अपने विषय भर बदल सकता हैवह अचोर नहीं हो सकता। लोभी अपने लोभ के विषय बदल सकता हैवह अलोभी नहीं हो सकता। तुम उस पर या वह स्वयं अपने पर अलोभ को लाद सकता हैलेकिन वह भी लोभ के लिए ही करेगा। यदि स्वर्ग का वादा किया जाएतो वह अलोभी होने का यत्न कर सकता है। लेकिन यह तो सबसे बड़ा लोभ हो गयापरम लोभ हो गया। अब स्वर्गमोक्षसच्चिदानंद उसके लोभ के लक्ष्य होंगे।
तंत्र कहता हैतुम आदमी को बदलाहट की प्रामाणिक विधि के बिना नहीं बदल सकते। मात्र उपदेश से कुछ नहीं बदलता है। और पूरी जमीन पर यही हो रहा है। तंत्र जो कुछ कह रहा हैसारा संसार उसकी गवाही दे रहा है। इतने उपदेशइतनी नैतिक शिक्षाइतने पुरोहितइतने प्रचारक! पृथ्वी उनसे पटी है। और फिर भी सब कुछ इतना अनैतिक है! इतना कुरूप है! ऐसा क्यों हो रहा है?
अगर अस्पताल उपदेशकों के हवाले कर दिए जाएं तो वहां भी यही होगा। वे वहां जाकर उपदेश शुरू कर देंगे। वे हर बीमार आदमी को कहेंगे कि तुम अपराधी होतुमने ही यह बीमारी खड़ी की हैपहले तुम उसे हटाओ। यदि अस्पताल उपदेशकों के जिम्मे कर दिए जाएं तो उनका क्या हाल होगावही जो समूचे संसार का है।
उपदेशक उपदेश किए चले जाते हैं। वे लोगों से कहते हैं कि क्रोध मत करो और उसके लिए कोई उपाय नहीं बताते। और हमने यह उपदेश बहुत—बहुत समय से सुना हैलेकिन कभी नहीं पूछा : क्या कहते होमैं क्रोधी हूं और तुम कहते हो कि क्रोध मत करो। यह कैसे संभव हैजब मैं क्रोध में हूं तो उसका मतलब है कि मैं क्रोध ही हूं। और तुम सिर्फ कहते हो कि क्रोध मत करो। तो क्या मैं अपना दमन करूंलेकिन दमन से तो और क्रोध पैदा होगा। उससे अपराध— भाव पैदा होगा। क्योंकि यदि मैं अपने को बदलने की कोशिश करूं और न बदल पाऊं तो मेरे भीतर हीनता पैदा होगी। उससे मुझ में अपराध— भाव पैदा होगा कि मैं निकम्मा हूं र कि मैं अपने क्रोध को नहीं जीत सकता।
वैसे क्रोध को कोई नहीं जीत सकता है। उसके लिए किसी उपाय कीकिसी विधि की जरूरत है। क्यौंकि तुम्हारा क्रोध तुम्हारे अशात चित्त का लक्षण है। अशांत मन को बदलो और लक्षण बदल जाएगा। क्रोध इतना भर दिखा रहा है कि भीतर क्या है। भीतर को बदलो और बाहर बदल जाएगा।
इसलिए तंत्र तुम्हारी तथाकथित नैतिकता की फिक्र नहीं करता। सच तो यह है कि नैतिकता पर जोर देना क्षुद्र है,अपमानजनक है। वह अमानुषिक है। यदि कोई मेरे पास आता है और मैं उससे कहता हूं कि पहले क्रोध छोड़ोपहले काम छोड़ो,पहले यह छोड़ो वह छोड़ो तो मैं अमानुषिक हूं। जो मैं कहता हूं वह असंभव है। और इस असंभावना के कारण ही वह आदमी भीतर से क्षुद्रता का अनुभव करेगा। वह दीन—हीन अनुभव करेगाअपनी ही आंखों में भीतर पतित मालूम पडेगा। यदि वह असंभव की चेष्टा करेगा तो हारेगा। और हार के कारण वह अपने को पापी मान बैठेगा।
उपदेशकों ने सारी दुनिया को समझा दिया है कि सब पापी हो। यह उनके लिए अच्छा है। जब तक तुम यह नहीं मानते कि तुम पापी होउनका धंधा नहीं चलेगा। तुम्हें पापी होना पड़ेगातभी गिरजेमंदिर और मस्जिद फूलते—फलते रहेंगे। तुम्हारा पाप में होना ही उनकी कमाई का मौसम है। तुम्हारा पाप ऊंचे से ऊंचे मंदिर—मस्जिद की नींव है। तुम जितने पापी होओगे उतना ही ऊंचा उनका शिखर उठेगा। वे तुम्हारे अपराध परपाप परतुम्हारे हीनता के भाव पर ही खड़े किए जाते हैं। और इस तरह उन्होंने एक दीन—हीन मनुष्यता का निर्माण किया है।
तंत्र तुम्हारी तथाकथित नैतिकता कीतुम्हारे सामाजिक रस्म—रिवाज आदि की चिंता नहीं करता है। इसका यह अर्थ नहीं कि तंत्र तुम्हें अनैतिक होने को कहता है। नहींतंत्र जब तुम्हारी नैतिकता की ही इतनी कम फिक्र करता है तो वह तुम्हें अनैतिक होने को नहीं कह सकता। तंत्र तो वैज्ञानिक विधि बताता है कि कैसे चित्त को बदला जाए। और एक बार चित्त दूसरा हुआ कि तुम्हारा चरित्र दूसरा हो जाएगा। एक बार तुम्हारे ढांचे का आधार बदला कि पूरी इमारत दूसरी हो जाएगी।
इसी अति नैतिक सुझाव के कारण तंत्र तुम्हारे तथाकथित साधु—महात्माओं को बर्दाश्त नहीं हुआ। वे सब उसके विरोध में खड़े हो गए। क्योंकि अगर तंत्र सफल होता है तो धर्म के नाम पर वाली सारी नासमझी समाप्त हो जाएगी।
यह देखो कि ईसाइयत वैज्ञानिक प्रगति के विरुद्ध जोर से लड़ती रही। क्योंकि उसने सोचा कि यदि भौतिक जगत में वैज्ञानिक प्रगति आई तो वह दिन दूर नहीं है जब विज्ञान मनोवैज्ञानिक और धार्मिक जगत में भी प्रवेश कर जाएगा। इसलिए ईसाइयत वैज्ञानिक प्रगति के खिलाफ जूझती रही। एक बार तुम जान गए कि विधियों के द्वारा तुम पदार्थ को बदल सकते हो तो किसी दिन तुम यह भी जान ही लोगे कि विधियों के द्वारा मन को भी बदल सकते हो। क्योंकि मन सूक्ष्म पदार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
यही तंत्र की प्रस्तावना है कि मन सूक्ष्म पदार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और यह बदला जा सकता है। और मन बदला कि संसार बदल गयाक्योंकि तुम मन के द्वारा ही देखते हो। जो संसार तुम देखते हो उसे वैसा एक विशेष मन के कारण देखते हो। मन को बदलों और तब देखोगे कि एक भिन्न संसार ही तुम्हारे सामने होगा। और जब मन अ—मन हो जाए—वह तंत्र का आत्यंतिक लक्ष्य है कि एक ऐसी अवस्था आए जहां मन ही न रहे—तब संसार को बिना माध्यम के देखो। और जब माध्यम नहीं रहा तब तुम सत्य के बिलकुल आमने—सामने होते हो। क्योंकि अब तुम्हारे और सत्य के बीच में कोई भी न रहा। तब कुछ भी विरूपविकृत नहीं किया जा सकेगा।
तंत्र कहता है कि उस अवस्था का नाम भैरव है जब मन नहीं रहता है—अ—मन की अवस्था। और तब पहली दफा तुम यथार्थत: उसको देखते हो जो है। जब तक मन हैतुम अपना ही संसार रचे जाते होतुम उसे आरोपितप्रक्षेपित किए जाते हो। इसलिए पहले तो मन को बदलो और तब मन को अ—मन में बदली।
और ये एक सौ. बारह विधियां सभी लोगों के काम आ सकती हैं। हो सकता हैकोई विशेष उपाय तुमको ठीक न पड़े। इसलिए तो शिव अनेक उपाय बताए चले जाते हैं। कोई एक विधि चुन लो जो तुमको जंच जाए।
और यह जानना कठिन नहीं है कि कौन सी विधि तुम्हें जंचती है। हम यहां प्रत्येक विधि को समझने की कोशिश करेंगे और बताएंगे कि कैसे तुम अपने लिए वह विधि चुन लो जो कि तुम्हें और तुम्हारे मन को रूपांतरित कर दे। यह समझयह बौद्धिक समझ बुनियादी तौर से जरूरी हैलेकिन यह अंत नहीं है। जिस विधि की भी चर्चा मैं यहां करूं उसको प्रयोग करो। सच में यह है कि जब तुम अपनी सही विधि का प्रयोग करते हो तब झट से उसका तार तुम्हारे किसी तार से लगकर बज उठता है।
इसलिए मैं यहां रोज—रोज विधियों की चर्चा किए जाऊंगा। तुम प्रयोग करना। बस उनसे खेलना। घर जाना और प्रयोग करना। और प्रयोग करते —करते जब तुम अपनी विधि के पास पहुंचोगे तो वह तुम्हारे भीतर खट से बज उठेगीवह तुम्हें घेर लेगी। तुम्हारे भीतर कुछ विस्फोट सा होगा और तुम जानोगे कि यह विधि मेरे लिए है। लेकिन प्रयास जरूरी है। और तुम चकित रह जाओगे कि किसी दिन एक विधि ने तुम्हें बस आच्छादित कर लिया है।

 इसलिए इधर मैं उनकी चर्चा किए जाऊंगा और उधर साथ ही साथ तुम उनके साथ म् खेलते जाना। मैं खेलना शब्द का व्यवहार करता हूं क्योंकि तुम्हें बहुत गंभीर नहीं होना है। बस खेलना। और खेल—खेल में ही तुम्हें कुछ जंच जाएगा। जब जंच जाए तब गंभीर हो जानातब उसमें गहरे उतर जाना—तीव्रता सेनिष्ठा सेपूरी ऊर्जा के साथपूरे मन से। लेकिन उसके पहले बस खेलना।
मैंने देखा है कि जब तुम खेलते हो तब तुम्हारा मन अधिक खुला रहता है। गंभीर होने पर वह उतना खुला नहीं होता,बंद होता है। इसलिए खेलना भर। गंभीर मत होनाखेलना। और ये विधियां बहुत सरल हैं। तुम उनके साथ खेल सकते हो।
एक विधि लो और उसके साथ तीन दिन खेलो। अगर तुम्हें उसके साथ निकटता की अनुभूति होअगर उसके साथ तुम थोड़ा स्वस्थ महसूस करोअगर तुम्हें लगे कि यह तुम्हारे लिए है तो फिर उसके प्रति गंभीर हो जाओ। तब दूसरी विधियों को भूल जाओउनसे खेलना बंद करो। और अपनी विधि के साथ टिकोकम से कम तीन महीने टिको। चमत्कार संभव है। बस इतना होना चाहिए कि वह विधि सचमुच तुम्हारे लिए हो। यदि तुम्हारे लिए नहीं है तो कुछ नहीं होगा। तब उसके साथ जन्मों—जन्मों तक प्रयोग करके भी कुछ नहीं होगा। और अगर विधि तुम्हारे लिए है तो तीन मिनट काफी हैं।
ये एक सौ बारह विधियां तुम्हारे लिए चमत्कारिक अनुभव बन सकती हैंया तुम उन्हें महज सुन सकते हो। यह तुम पर निर्भर हैमैं सभी संभव पहलुओं से प्रत्येक विधि की व्याख्या करूंगा। अगर तुम उसके साथ कुछ निकटता अनुभव करो तो तीन दिनों तक उससे खेलो और फिर छोड़ दो। अगर वह तुम्हें जंचेतुम्हारे भीतर कोई तार बजा दे तो फिर तीन महीने उसके साथ प्रयोग करो।
जीवन चमत्कार है। अगर हमने उसके रहस्य को नहीं जाना है तो उससे यही जाहिर होता है कि तुम्हें उसके पास पहुंचने की विधि नहीं मालूम है।
शिव यहां एक सौ बारह विधियां प्रस्तावित कर रहे हैं। इसमें सभी संभव विधियां सम्मिलित हैं। यदि इनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर नहीं 'जंचतीहैकोई भी तुम्हें यह भाव नहीं देती है कि वह तुम्हारे लिए है तो फिर कोई भी विधि तुम्हारे लिए नहीं बची। इसे ध्यान में रखो। तब अध्यात्म को भूल जाओ और खुश रहो। वह तब तुम्हारे लिए नहीं है।
लेकिन ये एक सौ बारह विधियां तो समस्त मानव—जाति के लिए हैं। और वे उन सभी युगों के लिए हैं जो गुजर गए हैं और आने वाले हैं। और किसी भी युग में एक भी ऐसा आदमी नहीं हुआ और न होने वाला ही हैजो कह सके कि ये सभी एक सौ बारह विधियां मेरे लिए व्यर्थ हैं। असंभव! यह असंभव है!
प्रत्येक ढंग के चित्त के लिए यहां गुंजाइश है। तंत्र में प्रत्येक किस्म के चित्त के लिए विधि है। कई विधियां हैं जिनके उपयुक्त मनुष्य अभी उपलब्ध नहीं हैंवे भविष्य के लिए हैं। और ऐसी विधियां भी हैं जिनके उपयुक्त लोग रहे नहींवे अतीत के लिए हैं। लेकिन डर मत जाना। अनेक विधियां हैं जो तुम्हारे लिए ही हैं।
तो कल से हम इस यात्रा पर निकलेंगे।
Kalpant Healing Center
Dr J.P Verma (Swami Jagteswer Anand Ji)
(Md-Acu, BPT, C.Y.Ed, Reiki Grand Master, NDDY & Md Spiritual Healing)
Physiotherapy, Acupressure, Naturopathy, Yoga, Pranayam, Meditation, Reiki, Spiritual & Cosmic Healing, (Treatment & Training Center)
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Wednesday, 31 January 2018

आलिंगन और उसकी विधियां

 आलिंगन और उसकी विधियां 


आलिंगन और उसकी विधियां आलिंगन का अर्थ है कामोत्तेजित करना, एक-दूसरे की त्वचा में घर्षण उत्पन्न करना, आपस में लिपटना, सहलाना, मसलना, भींचना, चुम्बन करना आदि।
बिना कामोत्तेजित हुए सेक्स करना शारीरिक व मानसिक रोगों को जन्म देना होता है। इसलिए सेक्स का वास्तविक आनन्द प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में संभोग के आठ चरण निर्धारित किए गए हैं। यह चरण स्त्री की कामाग्नि को जाग्रत करने से लेकर उसे सेक्स के अन्तिम चरण सीमा पर पहुंचाने के लिए आवश्यक है।
*!! संभोग से पहले आलिंगन क्यों जरूरी-!!*
आलिंगन करने से स्त्री पूरी तरह कामोत्तेजित हो जाती है। जिससे उसकी योनि द्रवित (योनि से सफेद रंग का द्रव्य निकलना जिससे योनि गीली) हो जाती है और लिंग आसानी से उसमें प्रवेश कर जाता है। इस प्रकार संभोग करने से स्त्री-पुरुष दोनों को पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती है। अगर स्त्री द्रवित नहीं हुई और पुरुष ने शुष्क योनि में शिश्न को प्रविष्ट करने की कोशिश कि या बलपूर्वक सहवास करने की कोशिश की तो स्त्री दर्द से व्याकुल हो जाएगी और संभोग का आनंद पीड़ा में परिवर्तित हो जाएगा। इसलिए संभोग से पहले आलिंगन क्रिया करना बहुत जरूरी होता है।
संभोग के आठ चरण –
आलिंगन।
चुम्बन।
नख क्रीड़ा।
दन्त रोमांच।
संवेशन (रती-क्रीड़ा के आसन)।
सीस्कृत (संभोग काल में कामुक ध्वनियां)।
पुरुषापित (नारी द्वारा पुरुष की भूमिका)।
औपरिष्टिक (मुख द्वारा यौन-क्रीड़ा)।
*!! आलिंगन-!!*
समागम का प्रथम चरण आलिंगन है। स्त्री-पुरुष का आपस में लिपट जाना, एक-दूसरे की बांहों में लिपटकर समा जाने का प्रयास करना ही आलिंगन है। वास्तव में रति-क्रीड़ा की शुरुआत आलिंगन से ही होती है।
वैसे तो आलिंगन के 8 भेद किए हैं मगर इन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-
1- अविवाहित आलिंगन (Per-marital embraces)
2- विवाहित आलिंगन (Per marital embraces)
*अविवाहित आलिंगन-*
इस प्रकार के आलिंगन का प्रयोग वे नर-नारी करते हैं जो एक-दूसरे से परिचित हो चुके होते हैं और जिनके हृदय में यौन प्रेम के बीज फूट चुके हों !! *!! इसके चार भेद किए गए हैं-!!*
*(1) स्पृष्टक-* इसमें एक दूसरे के शरीर का केवल स्पर्श किया जाता है। इसका प्रयोग अकेले न मिल पाने के कारण उपयुक्त अवसर मिलने पर किया जाता है। प्रेमी किसी बहाने से प्रेमिका के शरीर को हल्के-से छूते हुए आगे बढ़ जाता है। प्रेमिका भी इसी बहाने अपने प्रेमी के शरीर को छूते हुए जल्दी से आगे बढ़ जाती है। यह सब कुछ इतने आकस्मिक ढ़ंग से सम्पन्न हो जाता है कि किसी को इसका कोई आभास तक नहीं होने पाता। इस थोड़ी सी छुअन (स्पर्श) से दोनों के मन और शरीर में एक अद्भुत सनसनी प्रवाहित होने लगती है।
*(2) विद्धक-* इस आलिंगन की शुरुआत चतुर प्रेमिका खुद स्वयं करती है। अपने प्रेमी को किसी एकांत या निरापद स्थान में बैठे हुए अथवा खड़ा देखकर चुपचाप उसके पास पहुंच जाती है। प्रेमी अगर बैठा हुआ है तो नीचे रखी हुई किसी वस्तु को उठाने के बहाने वह इस प्रकार झुकती है कि उसके स्तन प्रेमी के शरीर को होले (धीरे) से स्पर्श करें। यदि प्रेमी खड़ा हुआ है तो प्रेमिका पीछे से जाकर उसे अपनी बांहों में कस लेती है। उसके पुष्ट स्तनों के स्पर्श से प्रेमी रोमांचित हो उठता है। इस आलिंगन का प्रयोग ऐसी प्रेमिकाओं के लिए उपयुक्त होता जिसके हृदय में प्रेम अंकुरित तो हो चुका है परन्तु पल्लवित नहीं हो पाया है। वैसे वे एक-दूसरे की ओर आकर्षित एवं सम्मोहित हो चुके होते हैं।
*(3) पीड़ितक-* इस आलिंगन का प्रयोग आपस में गहरा प्रेम एवं अनुराग बढ़ जाने पर किया जाता है। वास्तव में यह आलिंगन उद्धृष्टक का ही विकसित रूप है। इसमें पुरुष स्त्री को दीवार अथवा किसी वस्तु के सहारे खड़ा कर आलिंगनबद्ध कर लेता है और पूरी शक्ति का प्रयोग कर अपने शरीर से उसके कामुक (उतेजक) अंगों को घर्षण करता है। इस आलिंगन का प्रयोग प्रेमिका के द्वारा भी किया जा सकता है। यह आलिंगन इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि स्त्री-पुरुष दोनों मानसिक रूप से सेक्स यानि संभोग के लिए आतुर एवं बेचैन हैं !!
स्त्री-पुरुष का प्रेम जब परिपक्व हो चुका होता है तब दोनों लज्जा एवं संकोच से मुक्त होकर संभोग के आनंद से परिचित हो चुके होते हैं। उस समय संभोग से पहले अथवा बाद में प्रयोग होने वाले आलिंगनों को चार भेदों में बांटा गया है।
*1- लतावेष्टिक(लता के समान लिपट जाना)-* इसमें अपने सामने खड़े हुए प्रेमी को प्रेमिका आलिंगनबद्ध करके लता के समान अर्थात बेल की तरह लिपट जाती है और कामोद्दीप्त होकर प्रेमी के मुख तथा होठों का बार-बार चुम्बन करती है। साथ ही अपने प्रेमी को मजबूती से बांहों में जकड़कर अपने स्तनों से प्रेमी के सीने को भरपूर दबाव देकर प्रेमी को भी उत्तेजित कर देती है।
*2- वृक्षाधिरूढ़क(वृक्ष पर चढ़ने के समान)-* इसमें स्त्री अपना एक पैर पुरुष के पैर पर रखकर दूसरे पैर से उसकी जांघ तथा हाथों से कमर को जकड़ लेती है। दोनों की जांघे आपस में सट जाने के कारण शिश्न व योनि पर दबाव पड़ता है और दोनों की कामाग्नि भड़क उठती है। स्त्री आहें भरते हुए पुरुवृक्ष पर चढ़ने के समान क्रिया करती है।
*3- तिलतण्डुलक-* संभोग से पहले कामोद्दीपन (कामोत्तेजना) के लिए यह आलिंगन बिस्तर पर लेटकर किया जाता है। इसमें स्त्री ज्यादातर पुरुष के दाईं और लेटती है। दोनों करवट लेकर एक-दूसरे से चिपक जाते हैं। मुख से मुख, होठों से होठ, छाती से छाती, जांघों से जांघे, पैर से पैर तथा योनि से लिंग एकदम चिपक जाते हैं। इससे ऐसी कामोत्तेजना उत्पन्न होती है जिसमें संभोग किए बिना संतुष्टि प्राप्त नहीं होती है।
*4- क्षीरमलक-* इस आलिंगन में स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे में समा जाने को बेचैन हो जाते हैं। इस आलिंगन का प्रयोग अक्सर दो प्रकार से होता है !!
पहली क्रिया में स्त्री व पुरुष दोनों नग्न अवस्था में होते हैं। स्त्री पुरुष की गोद में बैठ कर उसे बाहों में जकड़ लेती है। स्त्री के पुष्ट स्तनों के दबाव से पुरुष सिहर उठता है !!
दूसरी क्रिया में पुरुष नीचे लेट जाता है और स्त्री उसके ऊपर इस प्रकार लेटती है कि दोनों के शरीर आपस में सट जाते हैं इससे यौनांगो में दबाव पड़ता है और कामोत्तेजना तीव्र रूप से उत्पन्न होती है जो संभोग करने के बाद ही समाप्त होती है !!
*!! इन आलिंगनों के अलावा कुछ और लोगों ने अन्य विधियों का उल्लेख किया है-!!*
*1- उरूपग्हन-* इस आलिंगन का प्रयोग स्त्री और पुरुष करवट के बल लेटकर करते हैं। इसमें पुरुष अपनी जांघों के बीच स्त्री की जांघों को बारी-बारी से बलपूर्वक दबाकर रोमांचित करता है। यही क्रिया स्त्री भी दोहराती है।
*2- जघनोपगहन-* यह प्रयोग पहले स्त्री द्वारा ही शुरु किया जाता है। इस आलिंगन में पुरुष नीचे लेट जाता है और स्त्री ऊपर से लेटकर अपनी जांघों तथा कमर से प्रेमी की जांघों तथा कमर को इस प्रकार से मिलाती है कि योनि से लिंग पर दबाव पड़ता है और दोनों ही कामोत्तेजित होकर चुम्बन क्रिया शुरू कर देते हैं।
*3- स्तनलिंगन-* यह आलिंगन भी स्त्री द्वारा ही किया जाता है। इसमें स्त्री खड़ी होकर, बैठकर, करवट से लेटकर या पुरुष के ऊपर लेटकर अपने पुष्ट स्तनों से उसकी छाती पर बार-बार दबाव देती है।
*4- ललाटिका-* इसमें भी स्त्री ही पहले शुरुआत करती है। पुरुष चित्त लेट जाता है। अब स्त्री उसके ऊपर इस प्रकार लेटती है कि माथा , आंखे तथा होंठ आपस में जुड़ जाते हैं। यह आलिंगन बहुत ही भावनात्मक एवं रागात्मक होता है। इसके प्रयोग से रोमांचयुक्त आनंद प्राप्त होता है !!

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मैथुन क्रिया

 मैथुन क्रिया


मैथुन उस क्रिया को कहते हैं जिसमें वंश वृद्धि की मूल प्रवृत्ति- काम-वासना के वशीभूत होकर दोनों भिन्न लिंगी प्राणी, स्त्री और पुरुष, एक-दूसरे के शारीरिक सम्पर्क में आ जाते हैं। पुरुष अपने शिश्न को योनि में प्रविष्ट करता है जिससे दोनों को ही बड़ा आनन्द मिलता है। इस आनन्द के कारण पुरुष बार-बार शिश्न का प्रहार योनि में करता है- और स्त्री चाहती भी है कि कुछ देर तक यह जनन अंगों की घर्षण क्रिया चलती रहे जिसके फलस्वरूप दोनों का आनन्द बढ़ता ही चला जाता है। जब यह आनन्द अपनी चरम-सीमा पर पहुंच जाता है जिसे चरमोत्कर्ष, चरम आवेग या पूर्ण उद्वेग (Orgasm) कहा जाता है तो पति और पत्नी दोनों ही स्खलित हो जाते हैं। पुरुष बीज या शुक्राणु वीर्य में मिलकर शिश्न के मार्ग से योनि में पहुंचे जाते हैं और इस प्रकार एक नये प्राणी को जन्म देने के लिए बीज बो दिया जाता है।
मैथुन क्रिया या सम्भोग को उसी समय सफल समझा जाता है जबकि दोनों के जनन अंगों में उचित समय तक और अच्छी तरह से घर्षण होता रहे। इसके लिए पुरुष के शिश्न में कड़ापन या उत्थान होना एक आवश्यक शर्त है। अतः हम अब मुख्य रूप से इस पर विचार करेंगे कि शरीर के कौन-कौन से अंग शिश्न में उत्थान लाने में सहायक होते हैं तथा किन उपायों से शिश्न को उत्थित और दृढ़ रखा जा सकता है। ताकि वह उस कार्य को पूरा कर सके जिसके लिए इसकी रचना की गई है। इस संबंध में हम सबसे पहले उस शारीरिक यन्त्र पर विचार करेंगे जो शिश्न पर नियन्त्रण रखता है, यह है मस्तिष्क । मनुष्य के प्रमस्तिष्क के उच्च क्षेत्रों (कोर्टेक्स) में कुछ विशिष्ट क्षेत्र ऐसा है जिसे उद्दीपन मिलने से मनुष्य की यौन सक्रियता बढ़ जाती है। करोड़ों न्यूरोन कोशिकाएं जो मस्तिष्क का निर्माण करती हैं उनका विकास भी लाखों वर्षों में हुआ है। प्रत्येक न्यूरोन को प्रकृति ने दो गुण दिए हैं- एक से यह मनुष्य को ऐसे कार्य करने के निर्देश देता रहे जिससे जीवित रहने के लिए वह समुचित मात्रा में भोजन जुटाता रहे और दूसरे से सैक्स क्रिया के लिए प्रेरित करता रहे ताकि मानव की वंश वृद्धि होती रहे। आज से लाखों साल पहले जब मानव शरीर सरल एक कोशिकीय रूप में था। उस समय प्रत्येक कोशिका अपना अलग भोजन ढूंढती थी और अपनी निजी सैक्स क्रिया करती थी। कुछ समय पश्चात इन प्राणियों ने अनुभव किया कि इन कार्यों को करने का उत्तर दायित्व एक केन्द्रीय संस्थान- स्नायु संस्थान या तान्त्रिक तन्त्र (Nervous system) को सौंप दिया जाए। अतः मस्तिष्क की तथा तन्त्रिका तन्त्र की प्रत्येक कोशिका का जब पहली-पहल विकास हुआ तो प्रकृति ने अपनी अमिट आज्ञा द्वारा इसको दो कार्य करने को दिये- भोजन प्राप्त करना और सेक्स क्रिया के लिए साथी को तलाश करना। चूंकि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका में ये गुण हैं अतः हम सरलता से समझ सकते हैं कि जिस समय हम निश्चिन्त अवस्था में होते हैं उस समय स्त्री को देखने, उसकी बोली सुनने या शरीर की गन्ध मात्र से हमारे शरीर में कामवासना जाग्रत होने लगती है !!
कामोत्तेजना के समय मस्तिष्क के अन्दर बड़े परिवर्तन होने लगते हैं। मस्तिष्क को जाने वाली रक्तवाहिनियों में रक्त का दबाव (प्रेशर) बढ़ जाता है और मस्तिष्क को अधिक मात्रा में रक्त मिलने लगता है।
यौन समागम या सम्भोग के समय दो अन्य केन्द्र भी निश्चित रूप से क्रियाशील हो उठते हैं ये हैं ताप नियन्त्रक केन्द्र और शर्करा का चयापचय करने वाला केन्द्र। सम्भोग के समय शरीर का ताप बढ़ जाता है ताकि प्रत्येक कोशिका के अन्दर तेजी के साथ होने वाले असाधारण रासायनिक परिवर्तन सुगमतापूर्वक होते रहें।
इस तनावपूर्ण भावनात्मक क्षणों में मस्तिष्क के साथ-साथ मेरुरज्जु (Spinal Chord) भी सक्रिय सहती है। मेरुरज्जु के नीचे के भाग में स्थित उत्थान केन्द्र (Erection Centre) लगातार उन तन्त्रिकाओं को उद्दीपन पहुंचाता रहता है जो शिश्न में जाने वाले रक्त पर नियन्त्रण रखती हैं। त्वचा के हर स्थान से मेरुरज्जु में होकर मस्तिष्क में उद्दीपन पहुंचते रहते हैं और मस्तिष्क से शरीर के प्रत्येक अंग और रक्तवाहिनियों में ये उद्दीपन पहुंचते रहते हैं। इन तनावपूर्ण क्षणों में प्रोस्टेट ग्रन्थि और शुक्राशय भी महत्वपूर्ण कार्य कर रहे होते हैं। यौन समागन के प्रारम्भिक चरणों में प्रोस्टेट ग्रन्थि फूल जाती है। प्रोस्टेट ग्रन्थि में स्राव अधिक मात्रा में बनने लगता है और इसमें अधिक मात्रा में रक्त आने लगता है। पेशियों का हर तन्तु तनाव की अवस्था में आ जाता है। मूत्रमार्ग जहां पर मूत्राशय में से मूत्र निकलता है वहां इसके उदगम स्थल पर वृत्त के रूप में जो प्रोस्टेटिक पेशी होती है वह मजवूती से संकुचित हो जाती है ताकि स्खलित होने वाला वीर्य मूत्राशय में न पहुंच जाए। प्रोस्टेट के अन्दर श्लेष्म भर जाता है और वेरुमोन्टेनम रक्त से भरकर फूल जाता है और इस स्थान पर प्रोस्टेट से आने वाले मार्ग को पूर्णतः अवरुद्ध कर देता है। सम्पूर्ण प्रोस्टेट की पेशियों की ऐंठन के रूप में होने वाले संकुचनों के कारण वीर्य के स्खलन में सुविधा हो जाती है। जैसे-जैसे सम्भोग होता है शुक्राशय भी फैलते जाते हैं। जिस समय स्खलन होने को होता है इन थैलियों की दीवारों में अत्यधिक तनाव आ जाता है। कामोत्तेजना के समय इन ग्रन्थियों में से एक पतला निरंग और अत्यन्त ही चिकना स्राव उत्पन्न होकर मूत्रमार्ग से निकलकर शिश्न मुण्ड को चिकना कर देता है ताकि शिश्न सुगमता से योनि में प्रविष्ट हो सके। इसके अतिरिक्त यह स्राव मूत्रमार्ग को भी चिकना कर देता है ताकि वीर्य सरलता से बाहर जा सके ऐसा समझा जाता है कि शिश्न मुण्ड इस स्राव से चिकना हो जाने पर इसके अन्दर की कोमल तन्त्रिकाएं अधिक संवेदनशील हो जाती है जिससे यौन समागम का आनन्द बढ़ जाता है। यह पारदर्शक स्राव समागम के समय ही निकलता हो ऐसी बात नहीं है। यह एक संबंधी विचार मन में उठने से भी यह स्राव निकलने लगता है। यह एक प्राकृतिक स्राव है और यह वीर्य नहीं है।
स्रावी या हार्मोन पैदा करने वाली ग्रंथियां यौन समागम के समय लगातार काम करती हैं। पीयूष ग्रन्थि के दोनों भाग अपने-अपने विशिष्ट हार्मोनों का उत्पादन करने लगते हैं जो मांस-पेशियों में ऐंठन जैसे संकुचन लाने के लिए आवश्यक हैं ताकि यौन अंग अपना काम सुचारू रूप से कर सकें। थायराइड ग्रन्थि से भी एक स्राव निकलता है ताकि यौन समागम के समय शरीर में जो तीव्र आँक्सीकरण क्रिया ऊतकों में होने वाले परिवर्तन को प्रेरित करने के लिए होती है, यह निर्बाध रूप में होती रहे। एड्रीनल ग्रन्थियों में भी अधिक सक्रियता की आवश्यकता इस समय होती है ताकि रक्तदाब को ऊंचा किया जा सके और सिम्पेथेटिक तन्त्रिका तन्त्र को सक्रिय बनाया जा सके। इस समय वृषणों के अन्तःस्राव का शरीर अवशोषण करने लगता है और शरीर के पर भाग में इन्हें पहुंचाता रहता है। इस समय शरीर का हर हिस्सा अधिक सक्रिय हो उठता है। थूक उत्पादन करने वाली ग्रन्थियां अधिक मात्रा में थूक का उत्पादन करने लगती हैं। स्वेद ग्रन्थियां अधिक सक्रिय हो उठती हैं, हृदय का प्रकम्पन हल्का मगर परन्तु तेज गति से होने लगता है और फेफड़े अपनी साधारण गति की अपेक्षा तेजी से फैलने व सिकुड़ने लगते हैं। गले, आमाशय, छोटी व बड़ी आंतों तथा गुदा संकोचन पेशियों में संकुचन बढ़ जाता है। सम्भवतः सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन शिश्न में दिखाई पड़ता है जिसमें जाने वाली धमनियां रक्त से पूरी तरह भर जाती हैं और शिराओं के मार्ग से केवल इतना ही रक्त वापस जाता रहता है जिससे ऊतकों के अन्दर उचित आक्सीकरण होता है !!
*!! शिश्न में उत्थान-!!*
संभोग या सैक्स क्रिया में शिश्न के उत्थान का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि इसके बिना संभोग करना असम्भव है। शिश्न में उत्थान लाने में कई संरचनाएं सहायता करती हैं। शिश्न के मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं-!! सिर या मुण्ड अथवा सुपारी, डण्डी या मध्य भाग और जड़। शिश्न मूल पेट से शुरू होती है। शिश्न अन्दर से स्पन्ज जैसा खोखला होता है। कामोत्तेजना के समय जब इसमें आने वाली धमनियां इसकी खोखली कोठरियों में रक्त भर देती हैं तो यह फूलकर ऊपर की ओर उठ आती हैं।
मेरुरज्जु के उस भाग में जो हमारे कटि क्षेत्र (Lumbar Area) में लगभग नाभि के नीचे होता है इसमें एक केन्द्र होता है जो उत्थान पर नियन्त्रण रखता है। इसी के निकट एक और केन्द्र होता है जो स्खलन पर नियन्त्रण रखता है। ये दोनों केन्द्र एक-दूसरे के सहयोग से कार्य करते हैं। स्त्री के मेरुरज्जु में भी इसी भाग में उत्थान तथा स्खलन पर नियन्त्रण रखने वाले केन्द्र होते हैं। शिश्न में उत्थान क्रिया मुख्य रूप से मानसिक क्रिया का ही प्रतिबिम्ब है। जब मस्तिष्क में काम सम्बन्धी विचार आते हैं तो शिश्न में उत्थान आ जाता है। शिश्न में उत्थान एक प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action) हैं। हम अपनी इच्छा शक्ति द्वारा हाथ-पैर हिला सकते हैं परन्तु इच्छा से शिश्न में उत्थान नहीं ला सकते। जिस प्रकार गर्म-गर्म जलेबियां बनते देखकर अनजाने ही हमारे मुंह में पानी आ जाता है उसी प्रकार सुन्दर नारी को देखकर शिश्न में उत्थान आ जाता है। शिश्न में उत्थान दो तरह से आता है-
1- मानसिक अर्थात् मस्तिष्क में कामोत्तेजक विचार आने से,
2- शिश्न मुण्ड या शिश्न को हाथ से सहलाने या इसके घर्षण से।
इसे प्रतिवर्ती(Reflex) क्रिया कहते हैं !!

*!! संभोग क्रिया का शास्त्रीय विवरण इस प्रकार होता है-!!*
   जब पुरुष के सामने स्त्री वास्तव में उपस्थित होती है अथवा उसकी आवाज, शरीर की गन्ध या उसके शरीर से स्पर्श होता है अथवा पुरुष अपनी कल्पना में स्त्री के साथ सेक्स करता है तो प्रमस्तिष्क में कामेच्छा उत्पन्न होती है। जब एक बार कामवासना (लिबिडो) जाग्रत हो जाती है तो उद्दीपन मस्तिष्क से चलते हुए मेरुरज्जु के उत्थान केन्द्र में पहुंचते हैं और यहां से तन्त्रिकाओं द्वारा शिश्न में पहुंचते हैं। इसके फलस्वरूप शिश्न में रक्त भर जाता है जिससे शिश्न में उत्थान आ जाता है। यहां तक कि इस क्रिया को मानसिक उत्थान कहा जा सकता है। शिश्न का, विशेषकर मुण्ड का, नारी के हाथों द्वारा अथवा योनि के साथ स्पर्श होने पर समाचार शिश्न से उत्थान केन्द्र में पहुंचता है और उत्थान केन्द्र तुरन्त ही उद्दीपन शिश्न को भेजता है जिससे शिश्न में उत्थान आ जाता है। इस दशा में मस्तिष्क से सम्पर्क रहने की जरूरत नहीं है। योनि क्षेत्र का स्पर्श करने पर इसी प्रकार नारी की योनि में भी उत्थान आता है !!
जब शिश्न को योनि में प्रवेश कर प्रहार किए जाते हैं तो बड़ी संख्या में उद्दीपन शिश्न की संवेदनग्राही तन्त्रिकाओं के मार्ग से उत्थान केन्द्र में पहुंचने लगते हैं। इस समय फूले हुए प्रोस्टेट और शुक्राशयों से भी उद्दीपन इस केन्द्र में पहुंचते रहते हैं। ये उद्दीपन मिलकर उत्थान को शक्ति तथा दृढ़ता देते रहते हैं। इस चरण को हम तन्त्रिकाओं और रक्तवाहिनियों द्वारा लाया गया उत्थान कह सकते हैं। जैसे-जैसे संभोग होता है मस्तिष्क और तन्त्रिकाओं से प्राप्त उद्दीपनों की मात्रा बढ़ती जाती है और तन्त्रिकाओं में तनाव बढते-बढ़ते आखिरी बिन्दु पर पहुंच जाता है। आखिरी में स्खलन केन्द्र का फ्यूज उड़ जाता है। मूत्रमार्ग, प्रोस्टेट, शुक्राशयों और मूलाधार की पेशियों में शक्तिशाली आंकुचन होने लगते हैं और पुरुष का वीर्य स्खलित हो जाता है तथा शिश्न बैठ जाता है !!
*!! नारी में उत्थान तथा स्खलन-!!*
पुरुष अथवा स्त्री दोनों में एक जैसे कारणों से ही कामवासना जाग्रत होती है और कामवासना जाग्रत होने का प्रभाव अर्थात उत्थान लगभग एक ही जैसा होता है। चूंकि शिश्न शरीर से बाहर होता है अतः इसमें उत्थान आने पर यह स्पष्ट दिखाई देने लगता है परन्तु योनि छुपी होने के कारण उत्थान इतना स्पष्ट दिखाई नहीं देता !! जिस समय नारी कामोत्तेजित हो जाती है तो उसकी सम्पूर्ण योनि शिश्न की तरह रक्त से भर जाने के कारण फूल जाती है, योनि का आगे का भाग कुछ खुलकर फैल जाता है और गर्भाशय में भी तनाव आ जाता है। इस समय योनि की दीवार में से रिस-रिसकर एक स्राव योनि में आने लगता है जो योनि को गीला बना देता है ताकि शिश्न का इससे घर्षण होने पर शिश्न अथवा योनि को कोई क्षति पहुंचने न पावे !!
यौन समागम अर्थात योनि में शिश्न के घर्षण से स्त्री और पुरुष दोनों को ही आनन्द मिलता है और जब यह आनन्द बढ़ते-बढ़ते अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है तो स्त्री और पुरुष दोनों ही स्खलित हो जाते हैं। स्खलन में पुरुष का तो वीर्य निकलता है परन्तु स्त्री में से कुछ नहीं निकलता। आम बोल-चाल में कहा जाता है कि स्त्री का रज छूटता है। यह एक गलत धारणा है। वास्तव में अत्यधिक कामोत्तेजित हो जाने पर किसी-किसी स्त्री की योनि में से उपरोक्त चिकना स्राव इतनी अधिक मात्रा में निकलने लगता है कि योनि के बाहर तक आ जाता है। सम्भव है प्राचीन काल में काम-शास्त्रियों ने इसे ही स्त्री का वीर्य या रज मान लिया हो !!
*!! कामवासना-!!*
अलग-अलग व्यक्तियों में कामेच्छा की मात्रा भी अलग-अलग होती है। कुछ लोग सैक्स को कोई विशेष महत्व नहीं देते हैं जबकि कुछ लोगों का जीवन सैक्स रूपी धुरी के चारों ओर घूमता रहता है। इस अन्तर का कारण यह नहीं होता कि कोई व्यक्ति शारीरिक गठन और स्वास्थ्य में बहुत तगड़ा है। पुरुष की पुंसत्व शक्ति अर्थात् सैक्स क्षमता पर कई चीजें प्रभाव डालती हैं। उसकी हार्मोन उत्पादक ग्रन्थियों की क्रियाशीलता, उसकी मानसिक विचारधारा और पर्यावरण, ये सब पुंसत्व शक्ति में अपना-अपना हाथ रखती हैं। आनुवंशिकता (Heredity) और पालन-पोषण का भी प्रभाव पड़ता है। एक वैज्ञानिक का मत है कि जिन लोगों में पुंसत्व शक्ति कम है वे प्रायः उन पिताओं की सन्तान होते हैं जिनमें यह क्षमता कम थी। ऐसे व्यक्तियों की सैक्स पावर कृत्रिम साधनों द्वारा एक निश्चित सीमा से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती। यह भी याद रखना चाहिए कि कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो बाहरी तौर पर सैक्स में ज्यादा दिलचस्पी न दिखाएं परन्तु उनमें सैक्स पावर अच्छी हो। या तो उसकी कामवासना किसी अन्य दिशा में मुड़ चुकी है अथवा कुछ प्रकार के भय, चिन्ताओं या मनोविकारों के कारण इसका दमन हो गया है।
कामइच्छा की तेजी ही नहीं बल्कि इसका समय भी अलग-अलग व्यक्तियों में कम व ज्यादा पाया गया है। मोटेतौर पर यह कहा जा सकता है कि सैक्स पावर उन लोगों में अधिक होता है जो भावुक प्रकृति के होते हैं और कामोत्तेजक वातावरण में रहते हैं जैसेकि संगीतज्ञ, कलाकार तथा कवि आदि !!
*!! कामेच्छा में उतार-चढ़ाव !!*
  यौन समागम होने के लिए यह जरूरी है कि तन्त्रिका-तन्त्र तथा हार्मोन उत्पादक ग्रन्थियां दोनों ही संतुलित रूप से सक्रिय हों। जैसाकि पहले बताया जा चुका है संभोग के तुरन्त पश्चात एक अवस्था क्लान्ति (थकान) की आती है जिसके दौरान कामोद्दीपन पंहुचने से भी कामेच्छा जाग्रत नहीं होती। स्वस्थ व्यक्ति में यह अवस्था बहुत थोड़ी देर की होती है तथा कुछ समय के विश्राम के बाद दोबारा कामोद्दीपन मिलने पर शिश्न में उत्थान आ सकता है। कामेच्छा में उतार-चढ़ाव अन्य कारणों से भी होता है। अधिकांश स्त्रियों में मासिक-धर्म से कुछ ही दिन पहले और कुछ समय पश्चात कामवासना अपने उच्चतम शिखर पर पहुंच जाती है। अनुभव में आया है कि पुरुषों में कामेच्छा सप्ताह में एक दिन अपने शिखर पर पहुंच जाती है और शायद यही कारण है कि अधिकांश विवाहित दम्पत्ति सप्ताह में एक बार यौन समागम करते हैं !! कामेच्छा पर बाहरी कारणों जैसेकि जलवायु तथा मौसम का भी काफी प्रभाव पड़ता है !!
यद्यपि उचित मात्रा में शारीरिक व्यायाम किया जाए तो इससे प्रायः सैक्स सक्रियता को उत्तेजना मिलती है लेकिन अधिक शारीरिक थकान से इसमें बाधा पड़ जाती है। अधिक मानसिक कार्य करने तथा केन्द्रिय तन्त्रिका तन्त्र में थकावट हो जाने से भी कामेच्छा दब जाती है !!
अन्त में यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि व्यक्ति का स्वास्थ्य गिर जाने पर कामेच्छा पूरी तरह लुप्त हो सकती है। यौन समागम में तन्त्रिकाओं की शक्ति बड़ी मात्रा में खर्च हो जाती है और यदि वह शक्ति कम है तो कामेच्छा स्वयं ही गायब होने लगती है। एक अनुभवी अर्थशास्त्री की तरह शरीर का भण्डार अपने अन्दर रिजर्व रखता है !! और अपनी शक्ति उन कार्यों में नहीं खर्च करता जो शरीर के लिए तात्कालिक महत्त्व के नहीं हैं। यौन समागम भी ऐसा ही कार्य है !!

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संभोग क्या है ?

 *!! संभोग क्या है ? !!* 


समान रूप से शारीरिक सम्बन्धों द्वारा भोगा गया आनन्द ही सम्भोग है। इसमें सेक्स का आनन्द स्त्री-पुरुष को समान रूप से प्राप्त होना आवश्यक है। स्खलन के साथ ही पुरुष को तो पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो जाती है और सेक्स सम्बन्ध स्थापित होते ही पुरूष का स्खलन निश्चित हो जाता है। यह स्खलन एक मिनट में भी हो सकता है तो दस मिनट में भी। अर्थात् पुरुष को पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए मुख्य रूप से स्त्री को मिलने वाले आनन्द की तरफ ध्यान देना आवश्यक है। अगर स्त्री इस आनन्द से वंचित रहती है, इसे सम्भोग नहीं माना जाना चाहिए। इस वास्तविकता से व्यक्ति पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर अपने तरीके से सेक्स सम्बन्ध बनाता है और स्त्री के आनन्द की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है। इसे केवल भोग ही मानना चाहिए। सम्भोग की वास्तविकता को समझे बिना इसे जानना मुश्किल होगा। विवाह के बाद व्यक्ति सम्भोग करने के स्थान पर भोग करता है तो इसका मतलब यह है कि वह इस तरफ से अनजान है कि स्त्री को सेक्स का पूरा आनन्द मिला कि नहीं। सम्भोग शब्द की महत्ता को समझें। स्त्री को भोगें नहीं, समान रूप से आनन्द को बांटे। यही संभोग है।
युवक-युवती जब विवाह के उद्देश्य को समझ विवाह-बंधन में बंधते हैं तो वे इस बात से अवगत होते हैं कि उनके प्रेम भरे क्रिया-कलापों का अंत संभोग होगा। प्रत्येक शिक्षित युवक-युवती यह जानते हैं कि संभोग विवाह का अनिवार्य अंग है। यदि कोई सहेली ऐसी नवयुवती से पूछती है कि तू विवाह करने तो जा रही है किन्तु यह भी जानती है कि संभोग कैसा होता है ? वो या तो इसका उत्तर टाल जाएगी अथवा कह देगी कि उसके बारे मे जानने की क्या आवश्यकता है? संभोग तो पुरुष करता है। इसलिए उसे ही जानना चाहिए कि संभोग कैसे करना चाहिए।
ऐसे प्रश्नों पर युवक हंसकर उत्तर देता है, भला यह भी कोई पूछने की बात है। संभोग करना कौन नहीं जानता।
*!! संभोग आरंभ करने की स्थिति-!!*
यह ठीक है कि अनेक प्रकार की काम-क्रीड़ा से स्त्री संभोग के लिए तैयार हो जाए और उसकी योनि तथा पुरुष के शिश्न मुण्ड में स्राव आने लगे तो योनि में शिश्न डालकर मैथुन प्रारम्भ कर देना चाहिए। परन्तु जिस बात पर हमें विशेष बल देना चाहिए वह यह है कि योनि में शिश्न डालने के पश्चात् ही काम-क्रीड़ाओं को बंद नहीं कर देना चाहिए, जिनके द्वारा स्त्री को संभोग के लिए तैयार किया गया है। यह ठीक है कि समागम के कुछ आसन ऐसे होते हैं जिनमें बहुत अधिक प्रणय क्रीड़ाओं की गुंजाइश नहीं होती, परन्तु ऐसे आसन बहुत कम होते हैं। योनि में शिश्न के प्रवेश करने के बाद जब तक संभव हो सके इन क्रियाओं को जारी रखना चाहिए। यदि किसी आसन में नारी का चुम्बन लेते रहना संभव न हो तो स्तनों को सहलाते और मसलते रहना चाहिए। अगर स्तनों को मसलना या पकड़कर दबाना भी संभव न हो तो इसके चुचकों का ही स्पर्श करते रहना चाहिए। इससे तात्पर्य यह है कि इस समय जो भी प्रणय-कीड़ा संभव हो सके, उसे जारी रखना चाहिए। इससे काम आवेग में वृद्धि होती है, मनोरंजन बढ़ता है और स्त्री के उत्साह में वृद्धि होती है।
*!! प्रणय क्रीड़ाएं अनिवार्य विषय !!*
जो लोग मैथुन कार्य प्रारम्भ होते ही प्रणय क्रीड़ा बंद कर देते हैं, वे प्रणव-क्रीड़ा को मैथुन से अलग मानते हैं। उनकी धारणा है कि मैथुन कार्य प्रारम्भ होते ही प्रणय क्रियाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यह धारणा बिल्कुल गलत है। इन दोनों चीजों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में आकर प्रणय-क्रीड़ाओं को एकदम बंद कर देने से वह सिलसिला टूट जाता है जिसमें स्त्री रुचि लेने लगी थी। इस बात को सदा याद रखना चाहिए कि काम-क्रीड़ा के दो उद्देश्य होते हैं- एक तो इस क्रिया द्वारा आनन्द प्राप्त करना और दूसरे दोनों सहयोगियों-विशेषतया-स्त्री को प्रणय-क्रिया के अंतिम कार्य अर्थात् संभोग के लिए तैयार करना। इन दोनों बातों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि यदि संभोग की स्थिति पर पहुंचकर प्रणय-क्रीड़ा में अनावश्यक अवरोध पैदा कर दिया जाए या इस क्रीड़ा को बंद ही कर दिया जाए तो स्त्री के मन में झुंझलाहट पैदा हो जाएगी। इस बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए इस दृश्य की कल्पना कीजिए।
पुरुष नारी के गले में बाहें डाले हुए उसके स्तनों का चुम्बन कर रहा है, साथ ही वह उन्हें मसलता जाता है और उसके चूचुकों को भी समय-समय पर स्पर्श कर लेता है। स्वाभाविक है कि इससे नारी के उत्साह और काम के आवेग में वृद्धि होती है। वह उसके हाथ को अपने स्तनों पर और दबा लेती है। इसका तात्पर्य यह है कि वह चाहती है कि पुरुष उनको और जोर से मसले, क्योंकि इससे उसे और अधिक आनन्द आता है। पुरुष इस संकेत को दूसरे रूप में लेता है और समझता है कि स्त्री पर कामोन्माद का पूरा आवेग चढ़ चुका है। बस वह स्तनों को मसलना बंद करके नारी की योनि में अपने शिश्न को प्रविष्ट करने की तैयारी करने लगता है। इससे स्त्री को बड़ी निराशा होती है। पुरुष उसकी योनि में शिश्न डाले, इसमें तो उसे कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु वह यह नहीं चाहती कि वह स्तनों को मसलना बंद कर दे। उसे उसके मर्दन (मसलने) से जो आनन्द प्राप्त हो रहा था, उसका सिलसिला बीच में टूट गया। वह यह नहीं चाहती थी। इसलिए यह आवश्यक है कि संभोग क्रिया आरंभ होते समय और उसके जारी रहते हुए न तो प्रणय-क्रीड़ा को समाप्त करें और न उसमें कोई रुकावट ही आने दें।
यह तो सभी लोग जानते हैं कि संभोग क्रिया में पुरुष और स्त्री दोनों ही समान रूप से भागीदार होते हैं, किन्तु बहुत से लोगों का विचार यह है कि पुरुष सक्रिय भागीदार की भूमिका अदा करता है तथा स्त्री केवल सहन करती है अथवा स्वीकार मात्र करती है यह विचार भ्रांतिपूर्ण है। स्त्रियों के जनन अंग बने ही इस प्रकार के हैं कि वे संभोग में कभी निष्क्रिय रह ही नहीं सकते। यूरोपीय देशों की अनेक कुमारी नवयुवतियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि जब पहली बार किसी पुरुष ने उनके उरोजों को पकड़कर चूचुकों को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया तो उनकी योनि में विशेष तरह की फड़क-सी अनुभव हुई और यह इच्छा जाग्रत हुई कि कोई कड़ी वस्तु उसमें जाकर घर्षण करें।
कुछ पत्नियां ऐसी होती हैं जो जान-बूझकर निष्क्रिय भूमिका अदा करना चाहती हैं। वे समझती हैं जब पति उसका चुम्बन, कुचमर्दन (स्तनों को सहलाना, मसलना) आदि करे तो उन्हें ऐसा आभास देना चाहिए कि पुरुष के इस कार्य से उन्हें आनन्द नहीं मिल रहा है। उन्हें आशंका होती है कि यदि वे आनन्द प्राप्ति का आभास देंगी तो पति यह समझ लेंगे कि वे विवाह से पूर्व संभोग का आनन्द ले चुकी हैं। इस प्रकार के विचारों को उन्हें अपने मन से निकाल देना चाहिए।
संभोग करते समय इस बात को याद रखना चाहिए कि संभोग में सबसे अधिक आनन्द प्राप्त करने के लिए जिस आवेग की आवश्यकता होती है, वह तभी प्राप्त हो सकता है जब योनि में शिश्न निरंतर गतिशील रहे। इस गति का संबंध हरकत करने से है। इस स्थिति में शिश्न कड़ा और सीधा होकर योनि की दीवारों की मुलायम परतों तथा गद्दियों के सम्पर्क में आ जाता है। इसके फलस्वरूप शिश्न के तंतुओं में अधिकाधिक तनाव आ जाता है जिसकी समाप्ति वीर्य स्खलन के साथ होती है।
संभोग करते समय बहुत से पुरुषों को आशंका रहती है कि योनि में उनका लिंग प्रवेश करते ही वे स्खलित हो जाएंगे। इसी आशंका से भयभीत होकर वे योनि में शिश्न प्रविष्ट करके जल्दी-जल्दी हरकत करने लगते हैं और इस प्रकार वे बहुत जल्दी स्खलित हो जाते हैं। सेक्स के वास्तविक आनन्द की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि शिश्न के पूर्णतया प्रविष्ट हो जाने के बाद स्त्री पुरुष दोनों स्थिर होकर चुम्बन मर्दन आदि करें। इसके थोड़ी देर बाद फिर गति आरंभ करें। जब फिर स्खलन होने की आशंका होने लगे, तब फिर रुककर चुम्बन आदि में प्रवृत्त हो जाएं, इससे दोनों को अधिकाधिक आनन्द प्राप्त होगा। इस स्थिति में स्त्री को चाहिए कि जब पुरुष गति लगाए तब वह योनि को संकुचित करे, जितना अधिक वह संकुचित करेगी, उतना ही पुरुष का आनन्द बढ़ेगा और वह क्रिया करने लगेगा। ऐसा करने से स्त्री और पुरुष दोनों को आनन्द आएगा। इस भांति रुक-रुककर गति लगाने से स्त्री पूर्ण उत्तेजना की स्थिति में पहुंच जाती है। उस समय उसकी इच्छा होती है कि अब पुरुष जल्दी-जल्दी गति देकर अपने-आपको और स्त्री दोनों को स्खलित कर दे। उस समय पुरुष को जल्दी-जल्दी गति लगानी चाहिए, स्त्री को भी इसमें अपनी ओर से पूरा सहयोग देना चाहिए। अधिकांश स्त्रियों की यह धारण सही नहीं है कि गति लगाना केवल पुरुष का ही काम है।
जब कुछ देर तक स्त्री-पुरुष के यौन अंग एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात करते रहते हैं तो इस क्रिया से अब तक मस्तिष्क को जो आनन्द मिल रहा था, वह बढ़ते-बढ़ते इतना अधिक हो जाना हो जाता है कि मस्तिष्क इससे अधिक आनन्द बर्दाश्त नहीं कर पाता। इस समय स्त्री-पुरुष यौन आनन्द की चरम सीमा पर पहुंच चुके होते हैं जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में चरमोत्कर्ष कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति में मस्तिष्क अपने आप संभोग क्रिया को समाप्त करने के संकेत देने लगता है। पुरुष व स्त्री स्खलित है जाते हैं। पुरुष के शिश्न से वीर्य निकलता है और स्त्री की योनि से पानी की तरह पतला द्रव्य।
*!! स्खलन के बाद !!*
संभोग के बाद जब वीर्य स्खलित हो जाता है तो अधिकांश पुरुष समझ लेते हैं कि अब काम समाप्त हो गया है और सो जाने के अलावा कोई काम शेष नहीं रह गया है। उनकी यह बहुत बड़ी भूल है। स्खलन के साथ ही मैथुन समाप्त नहीं हो जाता। वीर्य स्खलन का अर्थ केवल इतना है कि जिस पहाड़ की चोटी पर आप पहुंचना चाहते थे, वहां आप पहुंच गये हैं। अभी चोटी से नीचे भी उतरना है। नीचे उतरना भी एक कला है।
जो पुरुष वीर्य स्खलित होने के पश्चात सो जाता है या सोने की तैयारी करने लगता है, वह अपनी संगिनी की भावना को गहरा आघात पहुंचाता है। उसके मन में यह विचार आ सकता है कि उसका साथी केवल अपनी शारीरिक संतुष्टि को महत्त्व देता है, उसकी भावना की कोई परवाह नहीं करता। पुरुष का कर्त्तव्य है कि वह स्त्री के मन में ऐसी भावना पैदा न होने दे। स्त्री को संतुष्टि तथा आनन्द प्रदान करने के लिए पुरुष को चाहिए कि वह समागम के बाद स्त्री के विभिन्न अंगों का चुम्बन ले, प्रेमपूर्वक आलिंगन करे और कुछ समय प्रेमालाप करे। इन बातों से स्त्री को यह अनुभव होगा कि पुरुष उसे कामवासना की पूर्ति का खिलौना ही नहीं समझता, वास्तव में वह उससे प्रेम करता है। इसके अलावा संभोग के बाद पुरुष का आवेग जिस गति से शांत होता है स्त्री का आवेग उतनी तेजी से शांत नहीं होता। उसमें काफी समय लगता है। इसलिए यह आवश्यक है कि पुरुष धीरे-धीरे अपनी प्रणय क्रीड़ाओं से स्त्री को सामान्य दशा में लाए। जब उसे यह विश्वास हो जाए कि स्त्री का कामोन्माद पूरी तरह से शांत हो गया है तो भी उसे उसकी ओर मुंह फेरकर नहीं सोना चाहिए। उसे अपनी छाती से तब तक लगाए रखना चाहिए तब तक वह सो न जाए। उसके सोने के बाद ही स्वयं को सोना चाहिए।
*!! संभोग क्रीड़ा का वर्गीकरण !!*
शिश्न और योनि के आकार के भेद के अनुसार जिस प्रकार संभोग क्रीड़ा का वर्गीकरण किया गया है उसी प्रकार संवेग के आधार पर भी रति-क्रीड़ा के भेद निर्धारित किए गए हैं। जिस प्रकार दो व्यक्तियों के चेहरे आपस में नहीं मिलते, जिस प्रकार दो व्यक्तियों की रुचि एवं पसन्द में तथा शारीरिक ढ़ाचे एवं मानसिक स्तर में परस्पर भिन्नता होती है, उसी प्रकार दो नर-नारियों की कामुकता एवं यौन संवेगों में पर्याप्त अन्तर होता है। कुछ नर-नारियां ऐसी होती हैं जो प्रचण्ड यौन-क्रीड़ा को सहन नहीं कर पाती। प्रगाढ़ एवं कठोर आलिंगन, चुम्बन, नख-क्रीड़ा एवं दंतक्षत उन्हें नहीं भाता। ऐसे नर-नारियों को मृदुवेगी कहा गया है। कोमल प्रकृति होने के कारण इन्हें हल्का संभोग ही अधिक रुचिकारी होता है।
जिन नर-नारियों की यौन-चेतना औसत दर्जे की अथवा मध्यम दर्जे की होती है उन्हें मध्यवेगीय कहते हैं। ये न तो अति कामुक होते हैं और न ही इनकी यौन सचेतना मंद होती है। ये संभोग प्रिय भी होते हैं और यौन कला प्रवीण भी परन्तु काम पीड़ित नहीं होते हैं। पाक क्रीड़ा में अक्रामक रुख भी नहीं अपनाते। इनका यौन जीवन सामान्यतः संतुष्ट एवं आनन्दपूर्ण होता है। ये अच्छे तथा आदर्श गृहस्थ भी होते हैं।
चण्ड वेगी नर-नारियों की कामुकत्ता प्रचण्ड होती है। ये विलासी और कामी होते हैं। बार-बार यौन क्रियाओं के लिए इच्छुक रहते हैं। मौका पाते ही संभोग भी कर लेते है। संवेगात्मक तीव्रता अथवा न्यूनता के आधार पर स्त्री-पुरुष को जो वर्गीकरण किया गया है वह प्रकार है-
*!! समरति !!*
मनदवेगी नायक का सम्पर्क मन्दवेगी नारी के साथ।
मध्यवेगी नायक का वेग मध्यवेगी नारी के साथ।
चण्डवेगी नायक का जोड़ा चण्डवेगी नारी के साथ।
*!! विषमरति !!*
मन्दनेगी पुरुष सा सम्पर्क मध्यवगी नारी के साथ।
मन्दवेगी नायक का रमण चण्डवेगी नारी के साथ।
मध्यवेगी नर का जोड़ा मन्दवेगी नारी के साथ।
मध्यवेगी पुरुष का संबध चण्डवेगी नारी के साथ।
चण्डवेगी नायक का संभोग मन्दवेगी स्त्री के साथ।
चण्डवेगी नायक का समान समागम मध्यवेगी नारी के साथ।
*स्तंभनकाल-* कई पुरुषों में देर तक सेक्स करने की क्षमता नहीं होती है। ऐसे पुरुष योनि में शिश्न प्रवेश के कुछ सैकैण्ड के बाद ही स्खलित हो जाते हैं। कुछ पुरुषों की स्तंभन शक्ति मध्यम दर्जे की होती है। थोड़े ही पुरुष ऐसे होते हैं जो देर तक रति-क्रीड़ा करने में सक्षम होते हैं जो पुरुष अधिक देर तक नहीं टिक पाते वे स्त्री को संतुष्ट नहीं कर सकते। उनका विवाहित जीवन कलहपूर्ण हो जाता है। इसी तरह कुछ स्त्रियां शीघ्र ही संतुष्ट हो जाती हैं- कुछ स्त्रियां मात्र थोड़े वेगपूर्ण घर्षणों से ही संतुष्ट होती हैं और कुछ स्त्रियां करीब 10-15 मिनट तक निरंतर घर्षण के पश्चात ही संतुष्ट होती हैं। अतः यौन-संतुष्टि के लिए काल के आधार पर भी वर्गीकरण किया गया है।
शीघ्र स्खलित होने वाले पुरुष का संयोग शीघ्र संतुष्ट होने वाली स्त्री के साथ।
मध्यम अवधि तक टिकने वाले पुरुष का सेक्स संबंध मध्यकालिक रमणी (स्त्री) के साथ।
दीर्घकालिक पुरुष का समागम देर तक घर्षण करने के बाद पश्चात संतुष्ट होने वाली रमण प्रिया नारी के साथ।
उक्त सभी वर्गीकरण स्त्री-पुरुष की मनोशारीरिक रचना एवं संवेगात्मक तीव्रता के आधार पर किए गए हैं।
वही रति-क्रीड़ा सफल एवं उत्तम होती हैं जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों चरमोत्कर्ष के क्षणों में सब कुछ भूल कर दो शरीर एक प्राण हो जाते हैं। परन्तु यह तभी संभव होता है जबकि पुरुष को सेक्स संबंधी संपूर्ण जानकारी हो तथा जिसमें पर्याप्त स्तंभन शक्ति हो। जिन पुरुषों में देर तक सेक्स करने की क्षमता होती हैं उन पर स्त्रियां मर-मिटती हैं।
अनेक पुरुषों को यह भ्रम बना रहता है कि उनके समान ही स्त्रियां भी स्खलित होती हैं। यह धारणा भ्रामक, निराधार और मजाक भी है। पुरुषों के समान स्त्रियों में चरमोत्कर्ष की स्थिति में किसी भी प्रकार का स्खलन नहीं होता। नारी की पूर्ण संतुष्टि के लिए आवश्यक है कि रति-क्रीड़ा में संलग्न होने के पूर्ण नारी को कलात्मक पाक-क्रीड़ा द्वारा इतना कामोत्तेजित कर दिया जाये कि वह सेक्स संबंध बनाने के लिए स्वयं आतुर हो उठे एवं चंद घर्षणों के पश्चात ही आनन्द के चरम शिखर पर पहुंच जाएं। नारी को उत्तेजित करने के लिए केवल आलिंगन, चुम्बन एवं स्तन मर्दन ही पर्याप्त नहीं होता। यूं तो नारी का सम्पूर्ण शरीर कामोत्तेजक होता है, पर उसके शरीर में कुछ ऐसे संवेदनशील स्थान अथवा बिन्दु हैं जिन्हें छेड़ने, सहलाने एवं उद्वेलित करने में अंग-प्रत्यंग में कामोत्तेजना प्रवाहित होने लगती है।
*!! नारी के शरीर में कामोत्तेजना के निम्नलिखित स्थान संवेदनशील होते हैं-!!*
शिश्निका (सर्वाधिक संवेदनशील), भगोष्ठः बाह्य एवं आंतरिक, जांघें, नाभि क्षेत्र, स्तन (चूचक अति संवेदनशील), गर्दन का पिछला भाग, होंठ एवं जीभ, कानों का निचला भाग जहां आभूषण धारण किए जाते हैं, कांख, रीढ़, नितम्ब, घुटनों का पृष्ठ मुलायम भाग, पिंडलियां तथा तलवे।
इन अंगों को कोमलतापूर्वक हाथों से सहलाने से नारी शीघ्र ही द्रवित होकर पुरुष से लिपटने लगती है हाथों एवं उंगलियों द्वारा इन अंगों को उत्तेजित करने के साथ ही यदि इन्हें चुम्बन आदि भी किया जाए तो नारी की कामाग्नि तेजी से भड़क उठती है एवं रति क्रीड़ा के आनन्द में अकल्पित वृद्धि होती है। यह आवश्यक नहीं कि सभी अंगों को होंठ अथवा जिव्हा से आन्दोलित किया जाए यह प्रेमी और प्रिया की परस्पर सहमति एवं रुचि पर निर्भर करता है कि प्रणय-क्रीड़ा के समय किन स्थानों पर होठ एवं जीभ का प्रयोग किया जाए। उद्देश केवल यही है कि प्रत्येक रति-क्रीड़ा में नर और नारी को रोमांचक आनन्द की उपलब्धि समान रूप से होनी चाहिए। नारी की चित्तवृत्ति सदा एक समान नहीं रहती। किसी दिन यदि वह मानसिक अथवा शारीरिक रूप से क्षुब्ध हो, रति-क्रीड़ा के लिए अनिच्छा जाहिर करे तो किसी भी प्रकार की मनमानी नहीं करनी चाहिए। सामान्य स्थिति में भी प्रिया को पूर्णतः कामोद्दीप्त कर लेने के पश्चात् ही यौन-क्रीड़ा में संलग्न होना चाहिए।

*!! संभोग के लिए प्रवृत्ति या इच्छा-!!*
स्त्री भले ही सम्भोग के लिए जल्दी मान जाए, परन्तु यह जरूरी नहीं है कि वह इस क्रिया में भी जल्द अपना मन बना ले। पुरुषों के लिए यह बात समझना थोड़ी मुश्किल है। स्त्री को शायद सम्भोग में इतना आनन्द नहीं आता जितना कि सम्भोग से पूर्व काम-क्रीड़ा, अलिंगन, चुम्बन और प्रेम भरी बातें करने में आता है। जब तक पति-पत्नी दोनों सम्भोग के लिए व्याकुल न हो उठें तब तक सम्भोग नहीं करना चाहिए !!

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Thursday, 1 December 2016

तंत्र-सूत्र—विधि-08

तंत्र-सूत्र—विधि-08


आठवीं श्वा स विधि:
आत्यं तिक भक्तिि पूर्वक श्वायस के दो संधि-स्थालों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।
     इन विधियों के बीच जरा-जरा से है, तो भी तुम्हा-रे लिए वे भेद बहुत हो सकते है। एक अकेला शब्द  बहुत फर्क पैदा करता है।
      ‘’आत्यं तिक भक्तिफ पूर्वक श्वातस के दो संधि-स्थदलों पर केंद्रित होकर.....।‘’
      भीतर आने वाली श्वा स को एक संधि स्थ्ल है। जहां वह मुड़ती है। इन दो संधि-स्थ्लों—जिसकी चर्चा हम कर चुके है—के साथ यहां जरा सा भेद किया गया है। हालांकि यह भेद विधि में तो जरा सा ही है, लेकिन साधक के लिए बड़ा भेद हो सकता है। केवल एक शर्त जोड़ दी गई है—‘’आत्यं तिक भक्तिक पूर्वक’’, और पूरी विधि बदल गयी।

      इसके प्रथम रूप में भक्तिय का सवाल नहीं था। वह मात्र वैज्ञानिक विधि थी। तुम प्रयोग करो और वह काम करेगी। लेकिन लोग है जो ऐसी शुष्कत वैज्ञानिक विधियों पर काम नहीं करेंगे। इसलिए जो ह्रदय की और झुके है। जो भक्तिज  के जगत के है, उनके लिए जरा सा भेद किया गया है: आत्यं तिक भक्तिै पूर्वक श्वािस के दो संधि-स्थ लों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’
      अगर तुम वैज्ञानिक रुझान के नहीं हो, अगर तुम्हालरा मन वैज्ञानिक नहीं है, तो तुम इस विधि को प्रयोग में लाओ।
      आत्यंुतिक भक्तिइ पूर्वक—प्रेम श्रद्धा के साथ—श्वाञस के दो संधि स्थ लों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’
      यह कैसे संभव होगा।
      भक्तिस तो किसी के प्रति होती है। चाहे वे कृष्ण् हों या क्राइस्टा। लेकिन तुम्हाभरे स्वोयं के प्रति, श्वा्स के दो संधि-स्थललों के प्रति भक्ति  कैसी होगी। यह तत्वे तो गैर भक्तिर वाला है।  लेकिन व्यिक्ति्-व्यतक्तिि पर निर्भर है।
      तंत्र का कहना है कि शरीर मंदिर है। तुम्हािरा शरीर परमात्माक का मंदिर है, उसका निवास स्थादन है। इसलिए इसे मात्र अपना शरीर या एक वस्तुै न मानो। यह पवित्र है, धार्मिक है। जब तुम एक श्वायस भीतर ले रहे हो तब तुम ही श्वा्स नहीं ले रहे हो, तुम्हायरे भीतर परमात्मार भी श्वा स ले रहा है। तुम चलते फिरते हो—इसे इस तरह देखो—तुम नहीं, स्व यं परमात्माफ तुममें चल रहा है। तब सब चीजें पूरी तरह भक्ति  हो जाती है।
      अनेक संतों के बारे में कहा जाता है कि वे अपने शरीर को प्रेम करते थे, वे उसके साथ ऐसा व्यजवहार करते थे। मानो वे शरीर उनकी प्रेमिकाओं के रहे हों।
      तुम भी अपने शरीर को यह व्ययवहार दे सकते हो। उसके साथ यंत्रवत व्यकवहार भी कर सकते हो। वह भी एक रूझान है, एक दृष्टिज है। तुम इसे अपराधपूर्ण पाप भरा और गंदा भी मान सकते हो। और इसे चमत्काेर भी समझ सकते हो, परमात्माह का घर भी समझ सकते है, यह तुम पर निर्भर है।
      यदि तुम अपने शरीर को मंदिर मान सको तो यह विधि तुम्हातरे काम आ सकती है, ‘’आत्यं तिक भक्तिक पूर्वक....।‘’ इसका प्रयोग करो। जब तुम भोजन कर रहे हो तब इसका प्रयोग करो। यह न सोचो कि तुम भोजन कर रहे हो, सोचो कि परमात्मार तुममें भोजन कर रहा है। और तब परिवर्तन को देखो। तुम वही चीज खा रहे हो। लेकिन तुरंत सब कुछ बदल जाता है। अब तुम परमात्माख को भोजन दे रहे हो। तुम स्नाुन कर रहे हो। कितना मामूली सा काम है। लेकिन दृष्टि। बदल दो, अनुभव करो कि तुम अपने में परमात्मार को स्नाटन करा रहे हो, तब यह विधि आसान होगी।
      ‘’आत्यंबतिक भक्तिी पूर्वक श्वातस के दो संधि स्थ.लों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।
 ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र

तंत्र-सूत्र—विधि-11

तंत्र-सूत्र—विधि-11


शिथिल होने की दूसरी विधि:
      जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वार बंद कर दो। तब।
      यह बहुत सरल दिखता है। लेकिन उतना सरल है नहीं। मैं इसे फिर से पढ़ता हूं, ‘’ जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वार बंद कर दो। तब।‘’ यक एक उदाहरण मात्र है। किसी भी चीज से काम चलेगा। इंद्रियों के द्वार बंद कर दो जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो। और तब—तब घटना घट जाएगी। शिव कह क्याे रहे है?

      तुम्हाोरे पाँव में कांटा गड़ा है। वह दर्द देता है, तुम तकलीफ में हो। या तुम्हाुरे पाँव पर एक चींटी रेंग रही है। तुम्हेंक उसका रेंगना महसूस होता है। और तुम अचानक उसे हटाना चाहते हो। किसी भी अनुभव को ले सकते है। तुम्हें  धाव है जो दुखता है। तुम्हा रे सिर में दर्द है, या कहीं शरीर में दर्द है। विषय के रूप में किसी से भी काम चलेगा। चींटी का रेंगना उदाहरण भर है।
      शिव कहते है: ‘’जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के द्वारा बंद कर दो।‘’
      जो भी अनुभव हो, इंद्रियों के सब द्वार बंद कर दो करना क्यां है? आंखें बंद कर लो और सोचो कि मैं अंधा हूं और देख नहीं सकता। अपने कान बंद कर लो और सोचो कि मैं सुन नहीं सकता। पाँच इंद्रियाँ है, उन सब को बंद कर लो। लेकिन उन्हें  बंद कैसे करोगे।
      यह आसान नहीं है। क्षण भर के लिए श्वानस लेना बंद कर दो, और तुम्हा री सब इंद्रियाँ बंद हो जायेगी। और जब श्वा स रुकी है और इंद्रियाँ बंद है, तो रेंगना कहां है? चींटी कहां है? अचानक तुम दूर, बहुत दूर हो जाते हो।
      मरे एक मित्र है, वृद्ध है। वे एक बार सीढ़ी से गिर पड़े। और डॉक्टरों ने कहा कि अब वे तीन महीनों तक खाट से नहीं हिल सकेंगे। तीन महीने विश्राम में रहना है। और वे बहुत अशांत व्यहक्ति  थे। पड़े रहना उनके लिए कठिन था। मैं उन्हेंु देखने गया। उन्हों ने कहा कि मेरे लिए प्रार्थना करें और मुझे आशीष दें कि में मर जाऊं। क्यों।कि तीन महीने पड़े रहना मौत से भी बदतर है। मैं पत्थमर की तरह कैसे पडा रह सकता हूं। और सब कहते है कि हिलिए मत।
      मैंने उनसे कहा, यह अच्छा‍ मौका है। आंखें बंद करें और सोचें कि मैं पत्थ।र हूं, मूर्तिवत। अब आप हिल नहीं सकते। आखिर कैसे हिलेंगे। आँख बंद करें और पत्थ र की मूर्ति हो जाएं। उन्हों ने पूछा कि उससे क्याआ होगा। मैंने कहा की प्रयोग तो करें। मैं यहां बैठा हूं। और कुछ किया भी नहीं जा सकता। जैसे भी हो आपको तो यहां तीन महीने पड़े रहना है। इसलिए प्रयोग करें।
      वैसे तो वे प्रयोग करने वाले जीव नहीं थे। लेकिन उनकी यह स्थि ति ही इतनी असंभव थी कि उन्हों ने कहा कि अच्छा  मैं प्रयोग करूंगा। शायद कुछ हो। वैसे मुझे भरोसा नहीं आता कि सिर्फ यह सोचने से कि मैं पत्थमरवत हूं, कुछ होने वाला है। लेकिन मैं प्रयोग करूंगा। और उन्हों ने किया।
      मुझे भी भरोसा नहीं था कि कुछ होने वाला है। क्यों कि वे आदमी ही ऐसे थे। लेकिन कभी-कभी जब तुम असंभव और निराश स्थि ति में होते हो तो चीजें घटित होने लगती है। उन्होंलने आंखें बंद कर ली। मैं सोचता था कि दो तीन मिनट में वे आंखे खोलेंगे। और कहेंगे कि कुछ नहीं हुआ। लेकिन उन्होंनने आंखें नहीं खोली। तीस मिनट गुजर गए। और मैं देख सका कि वे पत्थनर हो गए है। उनके माथे पर से सभी तनाव विलीन हो गए। उनका चेहरा बदल गया। मुझे कही और जाना था, लेकिन वे आंखे बंद किए पड़े थे। और वे इतने शांत थे मानो मर गए है। उनकी श्वाकस शांत हो चली थी। लेकिन क्योंेकि मुझे जाना था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि अब आंखे खोलें और बताएं कि क्या  हुआ।
      उन्हों।ने जब आंखे खोली तब वे एक दूसरे ही आदमी थे। उन्हों ने कहा, यह तो चमत्का र है। आपने मेरे साथ क्याथ किया, मैंने कुछ भी नहीं किया। उन्होंंने फिर कहा कि आपने जरूर कुछ किया, क्योंयकि यह तो चमत्का।र है। जब मैंने सोचना शुरू किया कि मैं पत्थथर जैसा हूं तो अचानक यह भाव आया कि यदि मैं अपने हाथ हिलाना भी चाहता हूं तो उन्हेंभ हिलाना भी असंभव है। मैंने कर्इ बार अपनी आंखें खोलनी चाही, लेकिन वे पत्थ र जैसी हो गई थी। और नहीं खुल पा रही थी। और उन्हों ने कहा, मैं चिंतित भी होने लगा कि आप क्यार कहेंगे, इतनी देर हुई जाती है, लेकिन मैं असमर्थ था। मैं तीस मिनट तक हिल नहीं सका। और जब सब गति बंद हो गई तो अचानक संसार विलीन हो गया। और मैं अकेला रह गया। अपने आप में गहरे चला गया। और उसके साथ दर्द भी जाता रहा।
      उन्हेंा भारी दर्द था। रात को ट्रैंक्विलाइजर के बिना उन्हें  नींद नहीं आती थी। और वैसा दर्द चला गया। मैंने उनसे पूछा कि जब दर्द विलीन हो रहा था तो उन्हें  कैसा अनुभव हो रहा था। उन्हों ने कहा कि पहले तो लगा कि दर्द है, पर कहीं दूर पर है, किसी और को हो रहा है। और धीरे-धीरे वह दूर और दूर होता गया। और फिर एक दम से ला पता हो गया। कोई दस मिनट तक दर्द नहीं था। पत्थ र के शरीर को दर्द कैसे हो सकता है।
      यह विधि कहती है: ‘’इंद्रियों के द्वारा बंद कर दो।‘’
      पत्थिर की तरह हो जाओ। जब तुम सच में संसार के लिए बंद हो जाते हो तो तुम अपने शरीर के प्रति भी बंद हो जाते हो। क्यों कि तुम्हाेरा शरीर तुम्हाकरा हिस्साज न होकर संसार का हिस्सा। है। जब तुम संसार के प्रति बिलकुल बंद हो जाते हो तो अपने शरीर के प्रति भी बंद हो गए। और तब शिव कहते है, तब घटना घटेगी।
      इसलिए शरीर के साथ इसका प्रयोग करो। किसी भी चीज से काम चल जाएगा। रेंगती चींटी ही जरूरी नहीं है। नहीं तो तुम सोचोगे कि जब चींटी रेंगेगी तो ध्यानन करेंगे। और ऐसी सहायता करने वाली चींटियाँ आसानी से नहीं मिलती। इसलिए किसी सी भी चलेगा। तुम अपने बिस्तसर पर पड़े हो और ठंडी चादर महसूस हो रही है। उसी क्षण मृत हो जाओ। अचानक चादर दूर होने लगेगी। विलीन हो जाएगी। तुम बंद हो, मृत हो, पत्थ र जैसे हो, जिसमे कोई भी रंध्र नहीं है, तुम हिल नहीं सकते।
      और जब तुम हिल नहीं सकते तो तुम अपने पर फेंक दिये जाते हो। अपने में केंद्रित हो जाते हो। और तब पहली बार तुम अपने केंद्र से देख सकते हो। और एक बार जब अपने केंद्र से देख लिया तो फिर तुम वही व्यकक्तिब नहीं रह जाओगे जो थे।
 ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र

तंत्र-सूत्र—विधि-09

तंत्र-सूत्र—विधि-09

नौवीं विधि:
      मृतवत लेटे रहो। क्रोध में क्षुब्धो होकर उसमे ठहरे रहो। या पुतलियों को घुमाएं बिना एकटक घूरते रहो। या कुछ चुसो और चूसना बन जाओ।
      ‘’मृतवत लेटे रहो।‘’
      प्रयोग करो कि तुम एकाएक मर गए हो। शरीर को छोड़ दो, क्यों कि तुम मर गए हो। बस कल्पगना करो कि मृत हूं, मैं शरीर नहीं हूं, शरीर को नहीं हिला सकता। आँख भी नहीं हिला सकता। मैं चीख-चिल्ला। भी नहीं सकता। न ही मैं रो सकता हूं, कुछ भी नहीं कर सकता। क्यों कि मैं मरा हुआ हूं। और तब देखो तुम्हेंस कैसा लगता है। लेकिन अपने को धोखा मत दो। तुम शरीर को थोड़ा हिला सकते हो, नहीं, हिलाओ नहीं। लेकिन मच्छथर भी आ जाये, तो भी शरीर को मृत समझो। यह सबसे अधिक उपयोग की गई विधि है।

      रमण महर्षि इसी विधि से ज्ञान को उपलब्धआ हुए थे। लेकिन यह उनके इस जन्म  की विधि नहीं थी। इस जन्मआ में तो अचानक सहज ही यह उन्हें  घटित हो गई। लेकिन जरूर उन्हों ने किसी पिछले जन्मह में इसकी सतत सधाना की होगी। अन्यिथा सहज कुछ भी घटित नहीं होता। प्रत्येइक चीज का कार्य-कारण संबंध रहता है।
      जो जब वे केवल चौदह या पंद्रह वर्ष के थे, एक रात अचानक रमण को लगा कि मैं मरने वाला हूं, उनके मन में यक बात बैठ गई कि मृत्युा आ गई है। वे अपना शरीर भी नहीं हिला सकते थे। उन्हेंत लगा कि मुझे लकवा मार गया है। फिर उन्हेंर अचानक घुटन महसूस हुई और वे जान गए कि उनकी ह्रदय-गति बंद होने वाली है। और वे चिल्ला  भी नहीं सके, बोल भी नहीं सके कि मैं मर रहा हूं।
      कभी-कभी किसी दुस्वप्न में ऐसा होता है कि जब तुम न चिल्ला  पाते हो और न हिल पाते हो। जागने पर भी कुछ क्षणों तक तुम कुछ नहीं कर पाते हो। यही हुआ रमण को  अपनी चेतना पर तो पूरा अधिकार था। पर अपने शरीर पर बिलकुल नहीं। वे जानते थे कि मैं हूं, चेतना हूं, सजग हूं, लेकिन मैं मरने वाला हूं। और यह निश्च्य इतना घना था कि कोई विकल्प  भी नहीं था। इसलिए उन्होंिने सब प्रयत्ना छोड़ दिया। उन्होंीने आंखे बद कर ली और मृत्यु  की प्रतीक्षा करने लगे।
      धीरे-धीरे उनका शरीर सख्तन हो गया। शरीर मर गया। लेकिन एक समस्याथ उठ खड़ी हुई। वे जान रहे थे कि शरीर नहीं हूं। लेकिन मैं तो हूं, वे जान रहे थे कि मैं जीवित हूं, और शरीर मर गया है। फिर वे उस स्थिाति से वापस आए। सुबह में शरीर स्वाकस्थी था। लेकिन वही आदमी नहीं लौटा  था जो मृत्युं के पूर्व था। क्यों कि उसने मृत्युर को जान लिया था।
      अब रमण ने एक नए लोक को देख लिया था। चेतना के एक नए आयाम को जान लिया था। उन्होंकने घर छोड़ दिया। उस मृत्यु् के अनुभव ने उन्हेंल पूरी तरह बदल दिया। और वे इस यूग के बहुत थोड़े से प्रबुद्ध पुरूषों में हुए।
      और यहीं विधि है जो रमण को सहज घटित हुई। लेकिन तुमको यह सहज ही नहीं घटित होने वाली। लेकिन प्रयोग करो तो किसी जीवन में यह सहज हो सकती है। प्रयोग करते हुए भी यह घटित हो सकती है। और यदि नहीं घटित हुई तो भी प्रयत्न  कभी व्यतर्थ नहीं जाता है। यह प्रयत्नभ तुम में रहेगा। तुम्हािरे भीतर बीज बनकर रहेगा। कभी जब उपयुक्त   समय होगा और वर्षा होगी, यह बीज अंकुरित हो जाएगा।
      सब सहजता की यही कहानी है। किसी काल में बीज बो दिया गया था। लेकिन ठीक समय नहीं आया था। और वर्षा नहीं हुई थी। किसी दूसरे जन्मी और जीवन में समय तैयार होता है, तुम अधिक प्रौढ़, अधिक अनुभवी होते हो। और संसार में उतने ही निराश होते हो, तब किसी विशेष स्थिसति में वर्षा होती है और बीज फूट निकलता है।
      ‘’मृतवत लेटे रहो। क्रोध में क्षुब्ध  होकर उसमें ठहरे रहो।‘’
      निश्चिय ही जब तुम मर रहे हो तो वह कोई सुख का क्षण नहीं होगा। वह आनंदपूर्ण नहीं हो सकता। जब तुम देखते हो कि तुम मर रहे हो। भय पकड़ेगा। मन में क्रोध उठेगा, या विषाद, उदासी, शोक, संताप, कुछ भी पकड़ सकता है। व्य क्तिा-व्यसक्तिो में फर्क है।
      सूत्र कहता है—‘’क्रोध में क्षुब्धष होकर उसमे ठहरे रहो, स्थिेत रहो।‘’
      अगर तुमको क्रोध घेरे तो उसमे ही स्थिबत रहो। अगर उदासी घेरे तो उसमे भी। भय, चिंता, कुछ भी हो, उसमें ही ठहरे रहो, डटे रहो, जो भी मन में हो, उसे वैसा ही रहने दो, क्यों कि शरीर तो मर चुका है।
      यह ठहरना बहुत सुंदर है। अगर तुम कुछ मिनटों के लिए भी ठहर गए तो पाओगे कि सब कुछ बदल गया। लेकिन हम हिलने लगते है। यदि मन में कोई आवेग उठता है तो शरीर हिलने लगता है।  उदासी आती है, तो भी शरीर हिलता है। इसे आवेग इसीलिए कहते है कि यह शरीर में वेग पैदा करता है। मृतवत महसूस करो—और आवेगों को शरीर हिलाने इजाजत मत दो। वे भी वहां रहे और तुम भी वहां रहो। स्थितर, मृतवत। कुछ भी हो, पर हलचल नहीं हो, गति नहीं हो। बस ठहरे रहो।
      ‘’या पुतलियों को घुमाएं बिना एकटक घूरते रहो।‘’
      यह—या पुतलियों को घुमाएं बिना एकटक घूरते रहो। मेहर  बाबा की विधि थी। वर्षो वे अपने कमरे की छत को घूरते रहे, निरंतर ताकते रहे। वर्षो वह जमीन पर मृतवत पड़े रहे और पुतलियों को, आंखों को हिलाए बिना छत को एक टक देखते रहे। ऐसा वे लगातार घंटो बिना कुछ किए घूरते रहते थे। टकटकी लगाकर देखते रहते थे।
      आंखों से घूरना  अच्छा  है। क्यों कि उससे तुम फिर तीसरी आँख मैं स्थिआत हो जाते हो। और एक बार तुम तीसरी आँख में थिर हो गए तो चाहने पर भी तुम पुतलियों को नहीं घूमा सकते हो। वे भी थिर हो जाती है—अचल।
      मेहर बाबा इसी घूरने के जरिए उपलब्धत हो गए। और तुम कहते हो कि इन छोटे-छोटे अभ्याएसों से क्याग होगा। लेकिन मेहर बाबा लगातार तीन वर्षों तक बिना कुछ किए छत को घूरते रहे थे। तुम सिर्फ तीन मिनट के लिए ऐसी टकटकी लगाओ और तुमको लगेगा कि तीन वर्ष गुजर गये। तीन मिनट भी बहुत लम्बत समय मालूम होगा। तुम्हेंष लगेगा की समय ठहर गया है। और घड़ी बंद हो गई है। लेकिन मेहर बाबा घूरते रहे, घूरते रह, धीरे-धीरे विचार मिट गए। और गति बंद हो गई। मेहर बाबा मात्र चेतना रह गए। वे मात्र घूरना बन गए। टकटकी बन गए। और तब वे आजीवन मौन रह गए। टकटकी के द्वारा वे अपने भीतर इतने शांत हो गए कि उनके लिए फिर शब्दन रचना असंभव हो गई।
      मेहर बाबा अमेरिका में थे। वहां एक आदमी था जो दूसरों के विचार को, मन को पढ़ना जानता था। और वास्तरव में वह आमी दुर्लभ था—मन के पाठक के रूप में। वह तुम्हा रे सामने बैठता, आँख बंद कर लेता और कुछ ही क्षणों में वह तुम्हावरे साथ ऐसा लयवद्ध हो जाता कि तुम जो भी मन में सोचते, वह उसे लिख डालता था। हजारों बार उसकी परीक्षा ली गई। और वह सदा सही साबित हुआ। तो कोई उसे मेहर बाबा  के पास ले गया। वह बैठा और विफल रहा। और यह उसकी जिंदगी की पहली विफलता थी। और एक ही। और फिर हम यह भी कैसे कहें कि यह उसकी विफलता हुई।
      वह आदमी घूरता रहा, घूरता रहा, और तब उसे पसीना आने लगा। लेकिन एक शब्दी उसके हाथ नहीं लगा। हाथ में कलम लिए बैठा रहा और फिर बोला—किसी किस्म  का आदमी है। यह, मैं नहीं पढ़ पाता हूं, क्योंिकि पढ़ने के लिए कुछ है ही नहीं। यह आदमी तो बिलकुल खाली है। मुझे यह भी याद नहीं  रहता की यहां कोई बैठा है। आँख बंद करने के बाद मुझे बार-बार आँख खोल कर देखना पड़ता है कि यह व्यलक्तिक यहां है कि नहीं।  या यहां से हट गया है। मेरे लिए एकाग्र होना भी कठिन हो गया है। क्यों कि ज्यों  ही मैं आँख बंद करता हूं कि मुझे लगता है कि धोखा दिया जा रहा है। वह व्यंक्तिी यहां से हट जाता है। मेरे सामने कोई भी नहीं है। और जब मैं आँख खोलता हूं तो उसको सामने ही पाता हूं। वह तो कुछ भी नहीं सोच रहा है।
      उस टकटकी ने, सतत टकटकी ने मेहर बाबा के मन को पूरी तरह विसर्जित कर दिया था।
      ‘’या पुतलियों को घुमाएं बिना एकटक घूरते रहो। या कुछ चुसो और चूसना बन जाओ।‘’
      यहां जरा सा रूपांतरण है। कुछ भी काम दे देगा। तुम मर गए, यह काफी है।
      ‘’क्रोध में क्षुब्धक होकर उसमे ठहरे रहो।‘’
      केवल यह अंश भी एक विधि बन सकता है। तुम क्रोध में हो; लेटे रहो और क्रोध में स्थि त रहो। पड़े रहो। इससे हटो नहीं, कुछ करो नहीं, स्थिंर पड़ें रहो।
      कृष्णामूर्ति इसी की चर्चा किए चले जा रहे थे। उनकी पूरी विधि इस एक चीज पर निर्भर है: क्रोध से क्षुब्ध  होकर उसमे ठहरे रहो।‘’ यदि तुम क्रुद्ध हो तो क्रुद्ध होओ और क्रुद्ध रहो। उससे हिलो नहीं, हटो नहीं। और अगर तुम वैसे ठहर सको तो क्रोध चला जाता है। और तुम दूसरे आदमी बन जाते हो। और एक बार तुम क्रोध को उससे आंदोलित हुए बिना देख लो तो तुम उसके मालिक हो गए।
      ‘’या पुतलियों को घुमाएं बिना एक टक घूरते रहो। या कुछ चुसो और चूसना बन जाओ।‘’
      यह अंतिम विधि शारीरिक है। और प्रयोग में सुगम है। क्यों कि चूसना पहला काम है, जो कि कोई बच्चाि करता है। चूसना जीवन का पहला कृत्य  है। बच्चाा जब पैदा होता है, तब वह पहले रोता है। तुमने यह जानने की कोशिश नहीं की होगी कि बच्चाै क्यों  रोता है। सच में वह रोता नहीं है। वह रोता हुआ मालूम होता है। वह सिर्फ हवा का पी रहा है। चूर रहा है। अगर वह नहीं रोंए तो मिनटों के भीतर मर जाए। क्योंैकि रोना हवा लेने का पहला प्रयत्नक है। जब वह पेट में था, बच्चा  स्वांस नहीं लेता है। बिना स्वा स लिए वह जीता था। वह वहीं प्रक्रिया कर रहा था। जो भूमिगत समाधि लेने पर योगी जन करते है। वह बिना श्वा।स लिए प्राण को ग्रहण कर रहा था—मां से शुद्ध प्राण ही ग्रहण कर रहा था।
      यही कारण है कि मां और बच्चेक के बीच जो प्रेम है, वह और प्रेम से सर्वथा भिन्नह होता है। क्यों कि शुद्धतम प्राण दोनों को जोड़ता है। अब ऐसा फिर कभी नहीं होगा। उनके बीच एक सूक्ष्मध प्राणमय संबंध था। मां बच्चे् को प्राण देती थी। बच्चा  श्वा्स तक नहीं लेता था।
      लेकिन जब वह जन्मो लेता है, तब वह मां के गर्भ से उठाकर एक बिलकुल अनजानी दुनिया में फेंक दिया जाता है। अब उसे प्राण या ऊर्जा उस आसानी से उपलब्धक नहीं होगी। उसे स्वययं ही श्वाास लेनी होगी। उसकी पहली चीख चूसने का पहला प्रयत्न  है। उसके बाद वह मां के स्त न से दूध चूसता है। ये बुनियादी कृत्य  है जो  तुम करते हो। बाकी सब काम बाद में आते है। जीवन के वे बुनियादी कृत्य  है, और प्रथम कृत्य  उसका अभ्याेस भी किया जा सकता है।
      यह सूत्र कहता है: ‘’या कुछ चुसो और चूसना बन जाओ।‘’
      किसी भी चीज को चुसो , हवा को ही चुसो, लेकिन तब हवा को भूल जाओ और चूसना ही बन जाओ। इसका अर्थ क्याव हुआ? तुम कुछ चूस रहे हो, इसमें तुम चूसने वाले हो, चोषण नहीं। तुम चोषण के पीछे खड़े हो। यह सूत्र कहता है कि पीछे मत खड़े रहो, कृत्यन में भी सम्मिखलित हो जाओ और चोषण बने जाओ।
      किसी भी चीज से तुम प्रयोग कर सकते हो, अगर तुम दौड़ रहे हो तो दौड़ना ही बन जाओ और दौड़ने वाले न रहो। दौड़ना बन जाओ। दौड़ बन जाओ और दौड़ने वाले को भूल जाओ। अनुभव करो कि भीतर कोई दौड़ने वाला नहीं है। मात्र दौड़ने की प्रक्रिया है। वह प्रक्रिया तुम हो—सरिता जैसी प्रक्रिया। भीतर कोई नहीं है। भीतर सब शांत है। और केवल यह प्रक्रिया है।
      चूसना, चोषण अच्छा  है। लेकिन तुमको यह कठिन मालूम पड़ेगा। क्योंूकि हम इसे बिलकुल भूल गए है। यह कहना भी ठीक नहीं है कि बिलकुल भूल गए है। क्योंोकि उसका विकल्पह तो निकालते ही रहते है। मां के स्त न की जगह सिगरेट ले लेती है। और तुम उसे चूसते रहते हो। यह स्तैन ही है, मां का स्तरन, मां का चूचुक।  और गर्म धुआँ निकलता है, वह मां का दूध।
      इसलिए छुटपन में जिनको मां के स्तकन के पास उतना नहीं रहने दिया गया, जितना वे चाहते थे, वे पीछे चलकर धूम्रपान करने लगते है। यह बिलकुल भूल गए है, और विकल्पध से भी काम चल जाएगा। इसलिए अगर तुम सिगरेट पीते हो तो धुम्रपान ही बन जाओ। सिगरेट को भूल जाओ, पीने वाले को भूल जाओ और धूम्रपान ही बने रहो।
      एक विषय है जिसे तुम चूसते हो, एक विषयी है जो चूसता है। और उनके बीच चूसने की, चोषण की प्रक्रिया है। तुम चोषण बन जाओ प्रक्रिया बन जाओ। इसे प्रयोग करो। पहले कई चीजों से प्रयोग करना होगा और तब तुम जानोंगे कि तुम्हाचरे लिए क्या  चीज सही है।
      तुम पानी पी रहे हो। ठंडा पानी भीतर जा रहा है। तुम पानी बन जाओ। पानी न पीओ। पानी को भूल जाओ। अपने को भूल जाओ, अपनी प्याास को भी, और मात्र पानी बन जाओ। प्रक्रिया में ठंडक है, स्पीर्श है, प्रवेश है, और पानी है—वही सब बने रहो।
      क्योंह नहीं? क्याी होगा?  यदि तुम चोषण बन जाओ तो क्याग होगा?
      यदि तुम चोषण बन जाओ तो तुम निर्दोष हो जाओगे—ठीक वैसे जैसे प्रथम दिन जन्माच हुआ शिशु होता है। क्योंेकि वह प्रथम प्रक्रिया है। एक तरह से आप पीछे की और यात्रा करेंगे। लेकिन उसकी ललक, लालसा भी तो है। आदमी का पूरा अस्ति त्वक उस स्तन पान के लिए तड़पता है। उसके लिए वह कई प्रयोग करता है, लेकिन कुछ भी काम नहीं आता। क्यों कि वह बिंदु ही खो गया है। जब तक तुम चूसना नहीं बन जाते, तब तक कुछ भी काम नहीं आएगा। इसलिए इसे प्रयोग में लाओ।
      एक आदमी को मैंने यह विधि दी थी। उसने कई विधियां प्रयोग की थी। तब वह मेरे पास आया। उससे मैंने कहा, यदि मैं समूचे संसार से केवल एक चीज ही तुम्हें। चुनने को दूँ तो तुम क्यास चुनोगे? और मैंने तुरंत उसे यह भी कहा कि आँख बंद करो और इस पर तुम कुछ भी सोचे बिना मुझे बताओ। वह डरने लगा, झिझकने लगा। तो मैंने कहा, न डरों और न झिझाको। मुझे स्प,ष्टन बताओ। उसने कहा, यह तो बेहूदा मालूम पड़ता है। लेकिन मेरे सामने एक स्त न उभर रहा है। और यह कहकर वह अपराध भाव अनुभव करने लगा। तो मैंने कहा, मत अपराध भाव अनुभव करो। स्तभन में गलत क्या, है ? सर्वाधिक सुंदर चीजों में स्तभन एक है, फिर अपराध भाव क्योंर?
      लेकिन उस आदमी ने कहा, यह चीज तो मेरे लिए ग्रस्त ता बन गई है। इसलिए अपनी विधि बताने के पहले आप कृपा कर यक बताएं कि मैं क्यों  स्त्रिनयों के स्तरनों में इतना उत्सु क हूं? जब भी मैं किसी स्त्री को देखता हुं, पहले उसका स्ततन ही मुझे दिखाई देता है। शेष शरीर उतने महत्व  का नह रहता।
      और यह बात केवल उसके साथ ही लागू नहीं है। प्रत्येझक के साथ, प्रात: प्रत्येलक के साथ लागू है। और यह बिलकुल स्वा भाविक है। क्यों कि मां का स्तसन की जगत के साथ आदमी का पहला परिचय बनता है। यह बुनियादी है। जगत के साथ पहला संपर्क मां के स्तमन बनता है। यही कारण है कि स्ततन में इतना आकर्षण है, स्तिन इतना सुंदर लगता है। उसमे एक चुंबकीय शक्तित है।
      इसलिए मैंने उस व्य क्तिं से कहा कि अब मैं तुमको विधि दूँगा। और यही विधि थी जो मैंने उसे दी: किसी चीज को चुसो और चूसना बन जाओ। मैंने बताया कि आंखें बंद कर लो और अपनी मां का स्तबन याद करो या और कोई स्तंन जो तुम्हेंक पंसद हो, कल्पवना करो और ऐसे चूसना शुरू करो कि यह असली स्त‍न है। शुरू करो।
      उसने चूसना शुरू किया। तीन दिन के अंदर वह इतनी तेजी से, पागलपन के साथ चूसने लगा। और वह इसके साथ इतना मंत्र मुग्ध हो गया कि उसने एक दिन आकर मुझसे कहा, यह तो समस्यात बन गई है। सात दिन में चूसता ही रहा हूं। और यह इतना सुंदर है और इसमे ऐसी गहरी शांति पैदा होती है।‘’ और तीन महीने के अंदर उसका चोषण एक मौन मुद्रा बन गया। तुम होंठों से समझ नहीं सकते कि वह कुछ कर रहा है। लेकिन अंदर से चूसना जारी था। सारा समय वह चूसता रहता। यह जब बन गया।
      तीन महीने बाद उसके मुझसे कहा, ‘’कुछ अनूठा मेरे साथ घटित हो रहा है। निरंतर कुछ मीठी द्रव सिर से मेरी जीभ पर बरसता है। और यह इतना मीठा और शक्तिीदायक है। कि मुझे किसी और भोजन की जरूरत नहीं रही। भूख समाप्तर हो गई है। और भोजन मात्र औपचारित हो गया। परिवार में समस्यात न बने, इसलिए मैं दूध लेता हूं। लेकिन कुछ मुझे मिल रहा है जो बहुत मीठा है। बहुत जीवनदायी है।‘’
      मैंने उसे यह विधि जारी रखने को कहा।
      तीन महीने और। और वह एक दिन नाचता हुआ, पागल सा मेरे पास आया। और बोला, चूसना तो चला गया, लेकिन अब मैं दूसरा ही आदमी हो गया हूं। अब मैं वही नहीं रहा हूं। जो पहले था। मरे लिए कोई द्वार खुल गया है। कुछ टूट गया है। और कोई आकांक्षा शेष नहीं रही। अब मैं कुछ भी नहीं चाहता हूं, न परमात्माष। न मोक्ष, अब जो है, जैसा है, ठीक है। मैं उसे स्वीमकारता हूं और आनंदित हूं।‘’
      इसे प्रयोग में लाओ। किसी चीज को चुसो और चूसना बन जाओ। यह बहुतों के लिए उपयोगी होगा। क्यों कि यह इतना आधारभूत है।
 ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र

तंत्र-सूत्र—विधि-10

तंत्र-सूत्र—विधि-10


शिथिल होने की पहली विधि:
     प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्यव जीवन हो।
      शिव प्रेम से शुरू करते है। पहली विधि प्रेम से संबंधित है। क्यों कि तुम्हा रे शिथिल होने के अनुभव में प्रेम का अनुभव निकटतम है। अगर तुम प्रेम नहीं कर सकते हो तो तुम शिथिल भी नहीं हो सकते हो। और अगर तुम शिथिल हो सके तो तुम्हािरा जीवन प्रेमपूर्ण हो जाएगा।

      एक तनावग्रस्त  आदमी प्रेम नहीं कर सकता। क्यों ? क्योंोकि तनावग्रस्तर आदमी सदा उद्देश्यद से, प्रयोजन से जीता है। वह धन कमा सकता है। लेकिन प्रेम नहीं कर सकता। क्यों कि प्रेम प्रयोजन-रहित है। प्रेम कोई वस्तु  नहीं है। तुम उसे संग्रहीत नहीं कर सकते, तुम उसे बैंक खाते में नहीं डाल सकते। तुम उससे अपने अहंकार की पुष्टिे नहीं कर सकते। सच तो यह है कि प्रेम सब से अर्थहीन काम है; उससे आगे उसका कोई अर्थ नहीं है। उससे आगे उसका कोई प्रयोजन नहीं है। प्रेम अपने आप में जीता है। किसी अन्य  चीज के लिए नहीं।
      तुम धन कमाते हो—किसी प्रयोजन से। वह एक साधन नहीं है। तुम मकान बनाते हो—किसी के रहने के लिए। वह भी एक साधन है। प्रेम साधन नहीं है। तुम क्योंि प्रेम करते हो? किस लिए प्रेम करते हो?
      प्रेम अपना लक्ष्यि आप है। यही कारण है कि हिसाब किताब रखने वाला मन, तार्किक मन, प्रयोजन की भाषा में सोचने वाला मन प्रेम नहीं कर सकता। और जो मन प्रयोजन की भाषा में सोचता है। वह तनावग्रस्त  होगा। क्योंपकि प्रयोजन भविष्यै में ही पूरा किया जा सकता है। यहां और अभी नहीं।
      तुम एक मकान बना रहे हो। तुम उसमें अभी ही नहीं रह सकते। पहले बनाना होगा। तुम भविष्यो में उसमे रह सकते हो; अभी नहीं। तुम धन कमाते हो। बैंक बैलेंस भविष्यस में बनेगा, अभी नहीं। अभी साधन का उपयोग कर सकते हो, साध्य् भविष्यं में आएँगे।
      प्रेम सदा यहां है और अभी है। प्रेम का कोई भविष्यं नहीं है। यही वजह है कि प्रेम ध्याान के इतने करीब है। यही वजह है कि मृत्युं भी ध्या न के इतने करीब है। क्योंेकि मृत्यु  भी यहां और अभी है, वह भविष्या में नहीं घटती।
      क्यां तुम भविष्यक में मर सकते हो? वर्तमान में ही मर सकते हो। कोई कभी भविष्यन में नहीं मरा। भविष्यम में कैसे मर सकते हो? या अतीत में कैसे मर सकते हो। अतीत जा चुका वह अब नहीं है। इसलिए अतीत में नहीं मर सकते। और भविष्यत अभी आया नहीं है। इसलिए उसमे कैसे मरोगे?
      मृत्युे सदा वर्तमान में होती है। मृत्युअ प्रेम और ध्या न सब वर्तमान में घटित होते है। इसलिए अगर तुम मृत्युी से डरते हो तो तुम प्रेम नहीं कर सकते। अगर तुम मृत्युम से भयभीत हो तो तुम ध्यापन नहीं कर सकते। और अगर तुम ध्याुन से डरे हो तो तुम्हाारा जीवन व्य‍र्थ होगा। किसी प्रयोजन के अर्थ में जीवन व्यरर्थ नहीं होगा। वह व्य्र्थ इस अर्थ में होगा कि तुम्हें  उसमें किसी आनंद की अनुभूति नहीं होगी। जीवन अर्थहीन होगा।
      इन तीनों को—प्रेम, ध्याउन और मृत्युु को—एक साथ रखना अजीब मालूम पड़ेगा। वह अजीब है नहीं। वे समान अनुभव है। इसलिए अगर तुम एक में प्रवेश कर गए तो शेष दो में भी प्रवेश पा जाओगे।
      शिव प्रेम से शुरू करते है: ‘’प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्यप जीवन है।‘’
      इसका क्या  अर्थ है? कई चीजें, एक जब तुम्हें  प्रेम किया जाता है तो अतीत समाप्तक हो जाता है। और भविष्यि भी नहीं बचता। तुम वर्तमान के आयाम में गति कर जाते हो। तुम अब में प्रवेश कर जाते हो। क्याक तुमने कभी किसी को प्रेम किया है?यदि कभी किया है तो जानते हो कि उस क्षण मन नहीं होता है।
      यही कारण है कि तथाकथित बुद्धिमान कहते है कि प्रेम अंधे होते है, मन: शून्य और पागल होते है। वस्तुधत: वे सच कहते है। प्रेमी इस अर्थ में अंधे होते है। कि भविष्यब पर अपने किए का हिसाब रखने वाली आँख उनके पास नहीं होती। वे अंधे है, क्यों कि वे अतीत को नहीं देख पाते। प्रेमियों को क्या। हो जाता है?
      वे अभी और यही में सरक आते है, अतीत और भविष्यं की चिंता नहीं करते, क्याक होगा इसकी चिंता नहीं लेते। इस कारण वे अंधे कहे जाते है। वे है। जो गणित करते है, उनके लिए वे अंधे है, और जो गणित नहीं करते उनके लिए आँख वाले है। जो हिसाबी नहीं है वे देख लेंगे कि प्रेम ही असली आँख है, वास्त विक दृष्टि  है।
      इसलिए पहली चीज के प्रेम के क्षण में अतीत और भविष्यृ नहीं होते है। तब एक नाजुम बिंदु समझने जैसा है। जब अतीत और भविष्यो नहीं रहते तब क्या  तुम इस क्षण को वर्तमान कह सकते हो? यह वर्तमान है दो के बीच, अतीत और भविष्यक के बीच; यह सापेक्ष है। अगर अतीत और भविष्यद नहीं रहे तो इसे वर्तमान कहते में क्याक तुक है। वह अर्थहीन है। इसीलिए शिव वर्तमान शब्द  का व्यवहार नहीं करते। वे कहते है, नित्य  जीवन। उनका मतलब शाश्वमत से है—शाश्वकत में प्रवेश करो।
      हम समय को तीन हिस्सोंि में बांटते है—भूत, भविष्यक और वर्तमान। यह विभाजन गलत है। सर्वथा गलत है। केवल भूत और भविष्यन समय है, वर्तमान समय का हिस्सा  नहीं है। वर्तमान शाश्वजत का हिस्साय है। जो बीत गया वह समय है। जो आने वाला है समय है।
लेकिन जो है वह समय नहीं है। क्यों कि वह कभी बीतता नहीं है। वह सदा है। अब सदा है। वह सदा है। यह अब शाश्वोत है।
      अगर तुम अतीत से चलो तो तुम कभी वर्तमान में नहीं आते। अतीत से तुम सदा भविष्यस में यात्रा करते हो। उसमे कोई क्षण नहीं आता जो वर्तमान हो। तुम  अतीत से सदा भविष्यउ में गति करते रहते हो। आकर वर्तमान से तुम और वर्तमान में गहरे उतरते हो, अधिकाधिक वर्तमान में। यही नित्यव जीवन है।
      इसे हम इस तरह भी कह सकते है। अतीत से भविष्यो तक समय है। समय का अर्थ है कि तुम समतल भूमि पर और सीधी रेखा में गति करते हो। या हम उसे क्षैतिज कह सकते है। और जिस क्षण तुम वर्तमान में होते हो, आयाम बदल जाता है। तुम्हा‍री गति ऊर्ध्वानधर ऊपर-नीचे हो जाती है। तुम ऊपर, ऊँचाई की और जाते हो या नीचे गहराई की और जाते हो। लेकिन तब तुम्हादरी गति क्षैतिज या समतल नहीं होती है।
      बुद्ध और शिव शाश्वित में रहते है, समय में नहीं।
      जीसस से पूछा गया कि आपके प्रभु के राज्यी में क्यां होगा? जो पूछ रहा था वह समय के बारे में नहीं पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि वहां उसकी वासनाओं का क्याी होगा। वे कैसे पूरी होंगी? वह पूछ रहा था कि क्याा वहां अनंत जीवन होगा या वहां मृत्युो भी होगी। क्याू वहां दुःख भी रहेगा। और छोटे और बड़े लोग भी होंगे। जब उसने पूछा कि आपके प्रभु के राज्यं में क्या  होगा। तब वह इसी दुनिया की बात पूछ रहा था।
      और जीसस ने उत्तार दिया—यह उत्तऔर झेन संत के उत्तशर जैसा है—‘’वहां समय नहीं होगा।‘’ जिस व्यऔक्तिन को यह उत्तरर दिया गया था उसने कुछ नहीं समझा होगा। जीसस ने इतना ही कहा—वहां समय नहीं होगा। क्यों ? क्योंककि समय क्षैतिज है, और प्रभु का राज्यस ऊर्ध्वगामी है। वह शाश्व त है। वह सदा यहां है। उसमे प्रवेश के लिए तुम्हेंा समय से हट भर जाना है।
      तो प्रेम पहला द्वारा है। इसके द्वारा तुम समय के बाहर निकल सकते हो। यही कारण है कि हर आदमी प्रेम चाहता है, हर आदमी प्रेम करना चाहता है। और कोई नहीं जानता है कि प्रेम को इतनी महिमा क्यों  दी जाती है? प्रेम के लिए इतनी गहरी चाह क्यों  है? और जब तक तुम यह ठीक से न समझ लो, तुम ने प्रेम कर सकते हो और न पा सकते हो। क्योंहकि इस धरती पर प्रेम गहन से गहन घटना है।
      हम सोचते है कि हर आदमी, जैसा वह है, प्रेम करने को सक्षम है। वह बात नहीं है। और इसी कारण से तुम प्रेम में निराशा होते हो। प्रेम एक और ही आयाम है। यदि तुमने किसी को समय के भीतर प्रेम करने की कोशिश की तो तुम्हातरी कोशिश हारेगी। समय के रहते प्रेम संभव नहीं है।
      मुझे एक कथा याद आती है। मीरा कृष्णर के प्रेम में थी। वह गृहिणी थी—एक राजकुमार की पत्नीम। राजा को कृष्णम से ईर्ष्यान होने लगी। कृष्ण  थे नहीं। वे शरीर से उपस्थिनत नहीं थे। कृष्णस और मीरा की शारीरिक मौजूदगी में पाँच हजार वर्षों का फासला था। इसलिए यथार्थ में मीरा कृष्णं के प्रेम में कैसे हो सकती थी। समय का अंतराल इतना लंबा था।
      एक दिन राणा ने मीरा से पूछा, तुम अपने प्रेम की बात किए जाती हो, तुम कृष्णर के आसपास नाचती-गाती हो। लेकिन कृष्ण  है कहां? तुम किसके प्रेम में  हो? किससे सतत बातें किए जाती हो?
      मीरा ने कहां: कृष्ण  यहां है, तुम नहीं हो। क्योंहकि कृष्णि शाश्व त है। तुम नहीं हो, वे यहां सदा होंगे। सदा थे। वे यहां है, तुम यहां नहीं हो। एक दिन तुम यहां नहीं थे, किसी दिन फिर यहां नहीं होओगे। इसलिए मैं कैसे विश्वांस कुरू कि इन दो अनस्तित्व के बीच तुम हो। दो अनस्तित्व के बीच अस्तिंत्वक क्यात संभव है?
      राणा समय में है और कृष्ण‍ शाश्वदत में है। तुम राणा के निकट हो सकते हो। लेकिन दूरी नहीं मिटाई जा सकती। तुम दूर ही रहोगे। और समय में तुम कृष्णर से बहुत दूर हो सकते हो, तो भी तुम उनके निकट हो सकते हो। यह आयाम ही और है।
      मैं आपने सामने देखता हूं वहां दीवार है। फिर मैं अपनी आंखों को आगे बढ़ाता हूं और वहां आकाश है। जब तुम समय में देखते हो तो वहां दीवार है। और जब तुम समय के पार देखते हो तो वहां खुला आकाश है, अनंत आकाश।
      प्रेम अनंत का द्वार खोल सकता है। अस्ति त्वआ की शाश्वकतता का द्वार। इसलिए अगर तुमने कभी सच में प्रेम किया है तो प्रेम को ध्या्न की विधि बनाया जा सकता है। यह वहां विधि  है: ‘’प्रिय देवी प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि यह नित्यह जीवन हो।‘’
      बाहर-बाहर रहकर प्रेमी मत बनो, प्रेमपूर्ण होकर शाश्वेत में प्रवेश करो। जब तुम किसी को प्रेम करते हो तो क्याक तुम वहां प्रेमी की तरह होते हो? अगर होते हो तो समय में हो, और तुम्हाीरा प्रेम झूठा है। नकली है, अगर तुम अब भी वहां हो और कहते हो कि मैं हूं तो शारीरिक रूप से नजदीक होकर भी आध्याबत्मिऔक रूप से तुम्हाोरे बीच दो ध्रुवों की दूरी कायम रहती है।
      प्रेम में तुम न रहो, सिर्फ प्रेम रहे; इसलिए प्रेम ही हो जाओ। अपने प्रेमी या प्रेमिका को दुलार करते समय दुलार ही हो जाओ। चुंबन लेते समय चूसने वाले या चूमे जाने वाले मत रहो, चुंबन ही  बन जाओ। अहंकार को बिलकुल भूल जाओ। प्रेम के कृत्यन में धुल-मिल जाओ। कृत्यं में इतनी गहरे समा जाओ कि कर्ता न रहे।
      और अगर तुम प्रेम में नहीं गहरे उतर सकते तो खाने और चलने में गहरे उतरना कठिन होगा। बहुत कठिन होगा। क्यों कि अहंकार को विसर्जित करने के लिए प्रेम सब से सरल मार्ग है। इसी वजह से अहंकारी लोग प्रेम नहीं कर पाते। वे प्रेम के बारे में बातें कर सकते है। गीत गा सकते है। लिख सकते है; लेकिन वे प्रेम नहीं कर सकते। अहंकार प्रेम नहीं कर सकता है।
      शिव कहते है, प्रेम ही हो जाओ। जब आलिंगन में हो तो आलिंगन हो जाओ। चुंबन लेते समय चुंबन हो जाओ। अपने को इस पूरी तरह भूल जाओ कि तुम कह सको कि मैं अब नहीं हूं, केवल प्रेम है। तब ह्रदय नहीं धड़कता है, प्रेम की धड़कता है। तब खून नहीं दौड़ता है, प्रेम ही दौड़ता है। तब आंखे नहीं देखती है, प्रेम ही देखता है। तब हाथ छूने को नहीं बढ़ते है, प्रेम ही छूने को बढ़ता है। प्रेम बन जाओ और शाश्वूत जीवन में प्रवेश करो।
      प्रेम अचानक तुम्हांरे आयाम को बदल देता है। तुम समय से बाहर फेंक दिये जाते हो। तुम शाश्व्त के आमने-सामने खड़े हो जाते हो। प्रेम गहरा ध्या न बन सकता है—गहरे  से गहरा। और कभी-कभी प्रेमियों ने वह जाना है जो संतों न भी नहीं जाना। कभी-कभी प्रेमियों ने उस केंद्र को छुआ है जो अनेक योगियों ने नहीं छुआ।
      शिव को अपनी प्रिया देवी के साथ देखो। उन्हेंी ध्यापन से देखो। वे दो नहीं मालूम होते। वे एक ही है। यह एकांत इतना गहरा है। हम सबने शिव लिंग देखे है। ये लैंगिक प्रतीक है। शिव के लिंग का प्रतीक है। लेकिन वह अकेला नहीं है, वह देवी की योनि में स्थि त है। पुराने दिनों के हिंदू बड़े साहसी थे। अब जब तुम शिवलिंग देखते हो तो याद नह रहता कि यह एक लैंगिक प्रतीक है। हम भूल गए है। हमने चेष्टा पूर्वक इसे पूरी तरह भुला दिया है।
      प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जुंग ने अपनी आत्मनकथा में, अपने संस्म रणों में एक मजेदार घटना का उल्लेीख किया है। वह भारत आया और कोणार्क देखने को गया। कोणार्क के मंदिर में शिवलिंग है। जो पंडित उसे समझाता था उसने शिवलिंग के सिवाय सब कुछ समझाया। और वे इतने थे कि उनसे बचना मुश्किाल था। जुंग तो सब जानता था, लेकिन पंडित को सिर्फ चिढ़ाने के लिए पूछता रहा की ये क्या  है? तो पंडित ने आखिर जुंग के कान में कहा कि मुझे यहां मत पूछिये, मैं पीछे आपको बताऊंगा। यह गोपनीय है।
      जुंग मन ही मन हंसा होगा। ये है आज के हिंदू। फिरा बहार आकर पंडित ने कहा कि दूसरों के सामने आपका पूछना उचित न था। अब में बताता हूं। यह गुप्त  चीज है। और तब फिर उसने जुंग के कान में कहा ये हमारे गुप्तां ग है।
      जुंग जब यहां से वापस गया तो वहां वह एक महान विद्वान से मिला। पूर्वीय चिंतन मिथक और दर्शन के विद्वान, हेनरिख जिमर से। जुंग ने यह किस्सान जिमर को सुनाया। जिमर उन थोड़े से मनीषियों में था जिन्होंमने भारतीय चिंतन में डूबने की चेष्टा की थी। और वह भारत का उसकी विचारणा का, जीवन के प्रति उसके अतार्किक रहस्यउवादी दृष्टि वादी दृष्टि कोण का प्रेमी था। जब उसने जुंग से यह सूना तो वह हंसा और बोला, बदलाहट के लिए अच्छाक है। मैंने बुद्ध, कृष्ण , महावीर जैसे महान भारतीयों के बारे में सुना है। तुम तो सुना रहे हो वह किसी महान भारतीय के संबंध में नहीं, भारतीयों के संबंध में कुछ कहता है।
      शिव के लिए प्रेम महाद्वार है। और उनके लिए कामवासना निंदनीय नहीं है। उनके लिए काम बीज है और प्रेम उसका फूल है। और अगर तुम बीज की निंदा करते हो तो फूल की भी निंदा अपने आप हो जाती है। काम प्रेम बन सकता है। और अगर वह कभी प्रेम नहीं बनता है तो वह पंगु हो जाता है। पंगुता की निंदा करो, काम की नहीं। प्रेम को खिलना चाहिए। उसको प्रेम बनना चाहिए। और अगर यह नहीं होता है तो यह काम दोष नहीं है, यह दोष तुम्हामरा है।
      काम को काम नहीं रहना है। यहीं तंत्र की शिक्षा है। उसे प्रेम में रूपांतरित होना ही चाहिए। और प्रेम को भी प्रेम ही नहीं रहना है। उसे प्रकाश में , ध्यापन के अनुभव में अंतिम, परम रहस्य वादी शिखर में रूपांतरित होना चाहिए। प्रेम को रूपांतरित कैसे किया जाए?
            कृत्यह हो जाओ और कर्ता को भूल जाओ। प्रेम करते हुए प्रेम, महज प्रेम हो जाओ। तब यह तुम्हाकरा प्रेम मेरा प्रेम या किसी अन्यम का प्रेम नहीं है। तब यह मात्र प्रेम है, जब कि तुम नहीं हो, जब कि तुम परम स्त्रो त या धारा के हाथ में हो। तब कि तुम प्रेम में हो तुम प्रेम में नहीं हो, प्रेम न ही तुम्हेंब आत्म सात कर लिया है। तुम तो अंतर्धान हो गए हो। मात्र प्रवाहमान ऊर्जा बनकर रह गए हो।
      इस यूग का एक महान सृजनात्मजक मनीषी डी. एच. लॉरेंस, जाने अनजाने तत्र विद था। पश्चिसम में वि पूरी तरह निंदित हुआ। उसकी किताबें जब्तव हुई। उस पर अदालतों में अनेक मुकदमे चले, सिर्फ इसलिए कि उसने कहा कि काम ऊर्जा एक मात्र ऊर्जा है। और अगर तुम उसकी निंदा करते हो, दमन करते हो, तो तुम जगत के खिलाफ हो। और तब तुम कभी भी इस ऊर्जा की परम खिलावट को नहीं जान पाओगे। और दमित होने पर यह कुरूप हो जाती है। और यही दुस्चक्र है।
      पुरोहित, नीतिवादी, तथाकथित धार्मिक लोग, पोप, शंकराचार्य, और दूसरे लोग काम की सतत निंदा करते है। वे कहते है कि यह एक कुरूप चीज है। और तुम इसका दमन करते होत तो यह सचमुच कुरूप हो जाती है। तब वे कहते है कि देखो, जो हम कहते थे वह सच निकला। तुमने ही इसे सिद्ध कर दिया। तुम जो भी कर रहे हो वह कुरूप है, और तुम जानते हो कि वह कुरूप है।
      लेकिन काम स्वमयं में कुरूप नहीं है। पुरोहितों ने उसे कुरूप कर दिया है। और जब वे इसे कुरूप कर चूकते है तब वे सही साबित होते है। ओर जब वे सही साबित होते है तो तुम उसे कुरूप से कुरूप तर किए देते हो। काम तो निर्दोष ऊर्जा है। तुम में प्रवाहित होता जीवन है, जीवंत अस्ति त्व  है। उसे पंगु मत बनाओ। उसे उसके शिखरों की यात्रा करने दो। उसका अर्थ है कि काम को प्रेम बनना चाहिए। फर्क क्यार है?
      जब तुम्हाअरा मन कामुक होता है तो तुम दूसरे का शोषण कर रहे हो। दूसरा मात्र एक यंत्र होता है। जिसे इस्तेैमाल करके फेंक देना है। और जब काम प्रेम बनता है तब दूसरा यंत्र नहीं होता, दूसरे का शोषण नहीं किया जाता, दूसरा सच में दूसरा नहीं होता। तब तुम प्रेम करते हो तो यह स्वत-केंद्रित नहीं है। उस हालत में तो दूसरा ही महत्वहपूर्ण होता है। अनूठा होता है। तब तुम एक दूसरे का शोषण नहीं करते, तब दोनों एक गहरे अनुभव में सम्मिमलित हो जाते हो। साझीदार हो जाते हो। तुम शोषक और शोषित न होकर एक दूसरे को प्रेम की और ही दुनिया में यात्रा करने में सहायता करते हो। काम शोषण है, प्रेम एक भिन्नर जगत में यात्रा है।
      अगर यह यात्रा क्षणिक न रहे, अगर यह यात्रा ध्यासन पूर्ण हो जाए, अर्थात अगर तुम अपने को बिलकुल भूल जाओ और प्रेमी प्रेमिका विलीन हो जाएं और केवल प्रेम प्रवाहित होता रहे, तो शिव कहते है—‘’शाश्वलत जीवन तुम्हा रा है।‘’
 ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र

तंत्र-सूत्र—विधि-12

तंत्र-सूत्र—विधि-12


शिथिल होने की तीसरी विधि:
     जब किसी बिस्तिर या आसमान पर हो तो अपने को वजनशून्यक हो जाने दो—मन के पार।
     तुम यहां बैठे हो; बस भाव करो कि तुम वजनशून्यज हो गए हो। तुम्हाेरा वज़न न रहा। तुम्हें  पहले लगेगा कि कहीं यहां वज़न है। वजनशून्य‍ होने का भाव जारी रखो। वह आता है। एक क्षण आता है। जब तुम समझोगे कि तुम वज़न शून्या हो। वज़न नहीं है। और जब वज़न शून्यो नहीं रहा तो तुम शरीर नहीं रहे। क्यों।कि वज़न शरीर का है; तुम्हा रा नहीं, तुम तो वज़न शून्यो हो।
      इस संबंध में बहुत प्रयोग किए गये है। कोई मरता है तो संसार भर में अनेक वैज्ञानिकों ने मरते हुए व्यएक्तिम का वज़न लेने की कोशिश की है। अगर कुछ फर्क हुआ, अगर कुछ चीज शरीर के बहार निकली है, कोई आत्मा् या कुछ अब वहां नहीं है। क्यों कि विज्ञान के लिए कुछ भी बिना वज़न के नहीं है।
      सब पदार्थ के लिए वज़न बुनियादी है। सूर्य की किरणों का भी वज़न है। वह अत्यंात कम है, न्यूून है, उसको मापना भी कठिन है; लेकिन वैज्ञानिकों ने उसे भी मापा है। अगर तुम पाँच वर्ग मील के क्षेत्र पर फैली सब सूर्य किरणों को इकट्ठा कर सको तो उनका वज़न एक बाल के वज़न के बराबर होगा। सूर्य किरणों का भी वज़न है। वे तौली जा सकती है। विज्ञान के लिए कुछ भी वज़न के बिना नहीं है। और अगर कोई चीज वज़न के बिना है तो वह पदार्थ नहीं, उप पदार्थ। और विज्ञान पिछले बीस पच्चीास वर्षो तक विश्वा स करता था कि पदार्थ के अतिरिक्ती कुछ नहीं है। इसलिए जब कोई मरता है और कोई चीज शरीर से निकलती है तो वज़न में फर्क पड़ना चाहिए।
      लेकिन यह फर्क कभी न पडा, वज़न वही का वही रहा। कभी-कभी थोड़ा बढ़ा ही है। और वह समस्या, है। जिंदा आदमी का वज़न कम हुआ, मुर्दा का ज्यासदा। उसमे उलझने बढ़ी, क्योंहकि वैज्ञानिक तो यह पता लेने चले थे कि मरने पर वज़न घटता है। तभी तो वे कह सकते है कि कुछ चीज बाहर गई। लेकिन वहां तो लगता है। कि कुछ चीज अंदर ही आई। आखिर हुआ क्याे।
      वज़न पदार्थ का है, लेकिन तुम पदार्थ नहीं हो। अगर वजन शून्यता की हम विधि का प्रयोग करना है तो तुम्हेंु सोचना चाहिए। सोचना ही नहीं, भाव करना चाहिए कि तुम्हा‍रा शरीर वजनशून्य हो गया है। अगर तुम भाव करते ही गए। भाव करते ही गए। तो तुम वजनशून्य हो, तो एक क्षण आता है कि तुम अचानक अनुभव करते हो कि तुम वज़न शुन्यक हो गये। तुम वजनशून्य ही हो। इसलिए तुम किसी समय भी अनुभव कर सकते हो। सिर्फ एक स्थिजति पैदा करनी है। जिसमें तुम फिर अनुभव करो कि तुम वजनशून्य‍ हो। तुम्हेंु अपने को सम्मोेहन मुक्तर करना है।
      तुम्हाहरा सम्मोकहन क्याि है? सम्मोह न यह है कि तुमने विश्वा स किया है कि मैं शरीर हूं, और इसलिए वज़न अनुभव करते हो। अगर तुम फिर से भाव करों, विश्वा स करो कि मैं शरीर नहीं हूं, तो तुम वज़न अनुभव नहीं करोगे। यही सम्मोवहन मुक्ति  है कि जब तुम वज़न अनुभव नहीं करते तो तुम मन के पार चले गए।
      शिव कहते है: ‘’जब किसी बिस्तिर या आसन पर हो तो अपने को वजनशून्यन हो जाने दो—मन के पार।‘’ तब बात घटती है।
      मन का भी वज़न है। प्रत्ये’क आदमी के मन का वज़न है। एक समय कहा जाता था कि जितना वज़नी मस्तिेष्कद हो उतना बुद्धिमान होता है। और आमतौर से यह बात सही है। लेकिन हमेशा सही नहीं है। क्योंऔकि कभी-कभी छोटे मस्तिाष्कह के भी महान व्यहक्ति़ हुए है। और महा मूर्ख मस्तिौष्का भी वज़नी होते है।
      कुछ बातें। कभी-कभी मुर्दो का वज़न क्यों  बढ़ जाता है। ज्योंे ही चेतना शरीर को छोड़ती है कि शरीर असुरक्षित हो जाता है। बहुत सी चीजें उसमें प्रवेश कर जा सकती है। तुम्हाररे कारण वे प्रवेश नहीं कर सकती है। एक शिव में उनके तरंगें प्रवेश कर सकती है। तुममें नहीं कर सकती है। तुम यहां थे, शरीर जीवित था। वह अनेक चीजों से बचाव कर सकता था। यही कारण है कि तुम एक बार बीमार पड़े कि यह एक लंबा सिलसिला हो जाता है। एक के बाद दूसरी बीमारी आती चली जाती है। एक बार बीमार होकर तुम असुरक्षित हो जाते हो। हमले के प्रति खुल जाते हो। प्रतिरोध जाता रहता है। तब कुछ भी प्रवेश कर सकता है। तुम्हाेरी उपस्थिाति शरीर की रक्षा करती है। इसलिए कभी-कभी मृत शरीर का वज़न बढ़ सकता है। क्योंीकि जिस क्षण तुम उससे हटते हो, उसमे कुछ भी प्रवेश कर सकता है।
      दूसरी बात है कि जब तुम सुखी होते हो तो तुम वजनशून्यक अनुभव करते हो। और दुःखी होते हो तो वज़न अनुभव करते हो। लगता है कि कुछ तुम्हेंे नीचे को खींच रहा है। तब गुरुत्वाकर्षण बहुत बढ़ जाता है। दुःख की हालत में वज़न बढ़ जाता है। जब तुम सुखी होते हो तो हलके होते हो, तुम ऐसा अनुभव करते हो। क्यों ? क्योंककि जब तुम सुखी हो, जब तुम आनंद का क्षण अनुभव करते हो। तो तुम शरीर को बिलकुल भूल जाते हो। और जब उदास होते हो, दुःखी होते हो तब, शरीर के अति निकट आ जाते हो। उसे भूल नहीं पाते। उससे जूड़ जाते हो। तब तुम भार अनुभव करते हो। ये भार तुम्हाहरा नहीं है, तुम्हाारे शरीर से चिपकने का है, शरीर का है। वह तुम्हेंह नीचे की और खींच रहा है। जमीन की तरफ खींचता है, मानों तुम जमीन में गड़े जा रहे हो।  सुख में तुम निर्भार होते हो। शोक में, विषाद में वज़नी हो जाते हो।
      इसलिए गहरे ध्या न में, जब तुम अपने शरीर को बिलकुल भूल जाते हो, तुम जमीन से ऊपर हवा में उठ सकते हो। तुम्हाेरे साथ तुम्हाोरा शरीर भी ऊपर उठ सकता है। कई बार ऐसा होता है।
      बोलिविया में वैज्ञानिक एक स्त्री  का निरीक्षण कर रहे है। ध्या्न करते हुए वह जमीन से चार फीट ऊपर उठ जाती है। अब तो यह वैज्ञानिक निरीक्षण की बात है। उसके अनेक फोटो और फिल्मव लिए जा चुके हे। हजारों दर्शकों के सामने वह स्त्री  अचानक ऊपर उठ जाती है। उसके लिए गुरुत्वाकर्षण व्यसर्थ हो जाता है। अब तक इस बात की सही व्या ख्यार नहीं की जा सकी है कि क्योंक होता है। लेकिन वह स्त्री  गैर-ध्यायन की अवस्थाी में ऊपर नहीं उठ सकती। या अगर उसके ध्या न में बाधा हो जाए तो भी वह ऊपर से झट नीचे आ जाती है। क्याठ होता है?
            ध्याीन की गहराई में तुम अपने शरीर को बिलकुल भूल जाते हो। तादात्य््या टूट जाता है। शरीर बहुत छोटी चीज है और तुम बहुत बड़े हो। तुम्हा‍री शक्तिट अपरिसीम है। तुम्हा रे मुकाबले में शरीर तो कुछ भी नहीं है। यह तो ऐसा ही है कि जैसे एक सम्राट ने अपने गुलाम के साथ तादात्य् तो स्थासपित कर लिया है। इसलिए जैसे गुलाम भीख मांगता है। वैसे ही सम्राट भी भीख मांगता है। जैसे गुलाम रोता है। वैसे ही सम्राट भी रोता है। और जब गुलाम कहता है कि मैं ना कुछ हूं तो सम्राट भी कहता है। मैं ना कुछ हूं लेकिन एक बार सम्राट अपने अस्ति त्वक को पहचान ले, पहचान ले कि वह सम्राट है और गुलाम बस गुलाम है, से कुछ बदल जाएगा। अचानक बदल जाएगा।
      तुम वह अपरिसीम शक्तिु हो जो क्षुद्र शरीर से एकात्मा हो गई है। एक बार यह पहचान हो जाए, तुम अपने स्वु को जान लो, तो तुम्‍हारी वजन शून्यता बढ़ेगी। और शरीर का वज़न घटेगा। तब तुम हवा मैं उठ सकते हो, शरीर ऊपर जा सकता है।
      ऐसी अनेक घटनाएं है जो अभी साबित नहीं की जा सकती। लेकिन वे साबित होंगी। क्यों कि जब एक स्त्रीी चार फीट ऊपर उठ सकती है। तो फिर बाधा नहीं। दूसरा हजार फीट ऊपर उठ सकता है। तीसरा अनंत अंतरिक्ष में पूरी तरह जा सकता है। सैद्धांतिक रूप से यह काई समस्यात नहीं है। चार फीट ऊपर उठे कि चार सौ फीट कि चार हजार फीट, इससे क्याा फर्क पड़ता है।
      राम तथा कई अन्ये के बारे में कथाएं है कि वे शरीर विलीन हो गए थे। अनेक मृत शरीर इस धरती पर कहीं नहीं पाए गए। मोहम्मथद बिलकुल विलीन हो गए थे। शरीर ही नहीं आपने घोड़ के साथ। वे कहानियां असंभव मालूम पड़ती है। पौराणिक मालूम पड़ती है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वे मिथक ही हों। एक बार तुम वज़न शून्ये शक्तिं को जान जाओ। तो तुम गुरुत्वाकर्षण के मालिक हो गए। तुम उसका  उपयोग भी कर सकते हो, यह तुम पर निर्भर करता हे। तुम सशरीर अंतरिक्ष में विलीन हो सकत हो।
      लेकिन हमारे लिए वज़न शून्य।ता समस्या  रहेगी। सिद्घासन की विधि है। जिस में बुद्ध बैठते है, वजनशून्यय होने की सर्वोतम विधि है। जमीन पर  बैठो, किसी कुर्सी या अन्यत आसन पर नहीं। मात्र जमीन पर बैठो। अच्छाे हो कि उस पर सीमेंट या कोई कृत्रिमता नहीं हो। जमीन पर बैठो कि तुम प्रकृति के निकटतम रहो। और अच्छात हो कि तुम नंगे बैठो। जमीन पर नंगे बैठो—बुद्धासन में, सिद्घासन में।
      वज़न शून्य  होने के लिए सिद्घासन सर्वश्रेष्ठघ आसन है। क्यों? क्योंयकि जब तुम्हा्रा शरीर इधर-उधर झुका होता है तो तुम ज्यांदा वज़न अनुभव करते हो। तब तुम्हासरे शरीर को गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होने के लिए ज्याभदा क्षेत्र है। यदि मैं इस कुर्सी पर बैठा हूं तो मेरे शरीर का बड़ा क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होता है। जब तुम खड़े हो तो प्रभावित क्षेत्र कम हो जाता है। लेकिन बहुत देर तक खड़ा नहीं रहा जा सकता है। महावीर सदा खड़े-खड़े ध्यादन करते थे, क्योंतकि उस हालत में गुरुत्वाकर्षण का न्यूेनतम क्षेत्र घेरता है। तुम्हाेरे पैर भर जमीन को छूते है। जब पाँव पर खड़े हो तो गुरुत्वाकर्षण तुम पर न्यू नतम प्रभाव करता है। और गुरुत्वाकर्षण की वज़न है।
      पाँवों और हाथों को बांधकर सिद्घासन में बैठना ज्या।दा कारगर होता है। क्योंँकि तब तुम्हाकरी आंतरिक विद्युत एक वर्तुल बन जाती है। रीढ़ सीधी रखो। अब तुम समझ सकते हो कि सीधी रीढ़ रखने पर इतना जोर क्या  दिया जाता है। क्योंेकि सीधी रीढ़ से कम से कम जगह घेरी जाती है। तब गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव कम रहता है। आंखे बंद रखते हुए अपने को पूरी तरह संतुलित कर लो, अपने को केंद्रित कर लो। पहले दाई और झुककर गुरुत्वाकर्षण का अनुभव करो। फिर बाई और झुककर गुरुत्वाकर्षण का अनुभव करो। तब उस केंद्र को खोजों जहां गुरुत्वाकर्षण या वज़न कम से कम अनुभव होता है। और उस स्थिहति में थिर हो जाओ।
      और तब शरीर को भूल जाओ और भाव करो कि तुम वज़न नहीं हो। तुम वज़न शून्यक हो। फिर इस वज़न शून्यहता का अनुभव करते रहो। अचानक तुम वज़न शून्यज हो जाते हो। अचानक तुम शरीर नहीं रह जाते हो, अचानक तुम शरीर शून्य।ता के एक दूसरे ही संसार में होते हो।
      वज़न शून्य़ता शरीर शून्य ता है। तब तुम मन का भी अतिक्रमण कर जाते हो। मन भी शरीर का हिस्साय है, पदार्थ का हिस्सा  है। पदार्थ का वज़न होता है। तुम्हा रा कोई वज़न नहीं है। इस विधि का यही आधार है।
      किसी भी एक विधि को प्रयोग में लाओ। लेकिन कुछ दिनों तक उसमे लगे रहो। ताकि तुम्हेंो पता हो क वह तुम्हािरे लिए कारगर है या नहीं।
 ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र