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Sunday, 31 July 2016
Thursday, 28 July 2016
कावड़ का रहस्य
कावड़ का रहस्य
आज करोड़ों लोग आस्था के नाम पर हरिद्वार पहुंच रहे हैं। शायद प्रत्येक के मन में यह अंधविश्वास है कि शिव मंदिर में जल चढ़ाने से मन की इच्छाएं पूरी हो जाएंगी, हमारे पाप कम हो जाएंगे या कुछ पुण्य कमा लेंगे, आज के विज्ञानिक व आध्यात्मिक युग की गहराइयों को जानने वाले भारत में इतना बड़ा अंधविश्वास केवल यह दर्शाता है कि लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कितने पागल हैं, या उनके मन की चंचलता का इससे पता चलता है कि वो संन्तुष्ट नहीं हैं।
आज अगर सभी कावड़ लाने वाले वालों से एक सवाल पूछा जाए कि आपको कावड़ लाने के बाद क्या ऐसा मिल जाएगा जो न लाने वाले को नहीं मिलेगा, शायद किसी के पास भी इसका कोई सटीक जवाब नहीं होगा। वह एक अंधविश्वास जो सदियों से चला रहा है, हम उसी के पीछे दौड़ रहे हैं, और उसके पीछे छुपे रहस्य को भूल जाते हैं, जो सच था वह कहीं खो जाता है।
सत्य की बात बाद में करेंगे आईये पहले देखते हैं की कावड़ लाने वालों को क्या-क्या मिल रहा है। करोड़ो लोग पैदल यात्रा कर रहे हैं, उनके पैरों की हालत इतनी खराब हो गई है कि छाले पड़ गए हैं, सूजन आ गई है, घाव हो रहे हैं, चलना बस की नहीं है, फिर भी मजबूरी है चलना क्योंकि हमने आस्था के नाम पर यही सुना है, कि अब पैदल यात्रा ही करनी है। कई सौ किलोमीटर की यात्रा में बरसात व गर्मी को झेलने से वायरल का फैलना, बुखार सर्दी जुखाम की परेशानिया होना आम बात है। हर साल सावन में कांवड़ यात्रा में हादसे होते हैं, और बहुत से लोगो के जीवन का अंत हो जाता है, और फिर उनके परिवार वाले जीवन भर इसका दुखः झेलते हैं। हरिद्वार में जाकर 5 रू के काम के मजबूरी में 100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जहाँ 50रू में पेट भर अच्छा खाना मिल जाता है वहां 200रू में भी पेट नहीं भरता। किसी को समान चोरी का दुख, तो किसी को शारीरिक व मानसिक कष्ट। चलो जो कावंड ला रहे हैं, वो तो परेशान हो ही रहे हैं अंधविश्वास के लिए, परंतु उनके इस कृत्य से पूरा प्रशासन परेशान हो रहा है। उनकी सुरक्षा को लेकर, उनके उपद्वव को लेकर, पूरी व्यवस्था में हजारों लोग तैनात हैं कि कहीं कोई अप्रिय घटना ना घट जाए। और हजारों ऐसे लोग जो रोजाना कमाते है तब खाते हैं उनके काम 8 दिन तक बंद हो जाते हैं। इसकी वजह से वह भी शायद अपने मन से कहीं ना कहीं इन को बुरा ही कहते होंगे। सभी स्कूल बंद करने पड़ते हैं आठ दिन तक जिससे बच्चों की शिक्षा पर प्रभाव पढ़ता है। हजारों लोग नौकरी पर नहीं जा पाते, फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ती हैं, करोड़ों रुपए का आर्थिक नुकसान होता है इस अंधविश्वास से। इस प्रकार हमारे भारत में बहुत से अंधविश्वास है जिनको हम आस्था के नाम पर निभा रहे हैं, परन्तु इनको करने से मिलता तो कुछ नहीं, पर खोते बहुत कुछ है।
अब देखते हैं, कावंड का अध्यात्मिक रहस्य क्या है। हम सभी इच्छाओं को पूरी करने के लिए अंधविश्वास में दौड़ लगाते हैं। और लाखों लोगों में कुछ की इच्छाएं पूरी होती हैं कैसे। हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र होते हैं और जिनमें स्वाधिष्ठान चक्र हमारी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है। मनुष्य इस चक्र को जब जागृत करता है, तो उसकी जो भी इच्छाएं होती हैं, वो घटित हो जाती हैं। परंतु यह उसकी श्रद्वा और विश्वास के साथ कार्य करता है। इस को जागृत करने का मूल मंत्र बं (बम) हैं। और जब हम कावड़ लाते हैं तो लगाता बम बम का उच्चारण करते रहते हैं, और उस बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र में जागृति पैदा होती है, और उस समय आस्था की वजह से हमारे मन में शंका व अविश्वास भी नहीं होता है, तो हम जो इच्छा लेकर कावड़ ला रहे हैं वह घटित हो जाती है। पर कितने लोग इस श्रद्धा व विश्वास के साथ कावंड ला रहे हैं शायद बहुत कम। इसलिए लाखों में कुछ लोगों की इच्छा ही पूरी हो पाती हैं, बाकी सब व्यक्ति व्यर्थ ही परेशान होते हैं।
अब जब हमें पता होता है, कि हम केवल बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करके अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं तो इतना कर्मकांड क्यों, यही अंधविश्वास है। हमारे संतो ने स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने के लिए इसके रहस्य को आस्था से जोड़ दिया और लोग इस आस्था के नाम पर अंधविश्वास में दौड़ लगाने लगे। आध्यात्मिकता के साथ कुछ शारीरिक लाभ भी मिलते हैं जैसे कष्टों को झेलने से आपकी प्रतिरोधक क्षमता व सहनशक्ति बढ़ती है। आपके अंदर संकल्प को पूरा करने की इच्छा शक्ति मजबूत होती है और श्रद्धा व विश्वास बढ़ता है पर क्या इसको पाने के लिए इतना सब कुछ करना उचित है सोचे?
स्वामी जगतेश्वर आनंद जी (स्वंतत्र लेखक व समाजिक कार्यकर्ता) म.नं. 9958502499
आज करोड़ों लोग आस्था के नाम पर हरिद्वार पहुंच रहे हैं। शायद प्रत्येक के मन में यह अंधविश्वास है कि शिव मंदिर में जल चढ़ाने से मन की इच्छाएं पूरी हो जाएंगी, हमारे पाप कम हो जाएंगे या कुछ पुण्य कमा लेंगे, आज के विज्ञानिक व आध्यात्मिक युग की गहराइयों को जानने वाले भारत में इतना बड़ा अंधविश्वास केवल यह दर्शाता है कि लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कितने पागल हैं, या उनके मन की चंचलता का इससे पता चलता है कि वो संन्तुष्ट नहीं हैं।
आज अगर सभी कावड़ लाने वाले वालों से एक सवाल पूछा जाए कि आपको कावड़ लाने के बाद क्या ऐसा मिल जाएगा जो न लाने वाले को नहीं मिलेगा, शायद किसी के पास भी इसका कोई सटीक जवाब नहीं होगा। वह एक अंधविश्वास जो सदियों से चला रहा है, हम उसी के पीछे दौड़ रहे हैं, और उसके पीछे छुपे रहस्य को भूल जाते हैं, जो सच था वह कहीं खो जाता है।
सत्य की बात बाद में करेंगे आईये पहले देखते हैं की कावड़ लाने वालों को क्या-क्या मिल रहा है। करोड़ो लोग पैदल यात्रा कर रहे हैं, उनके पैरों की हालत इतनी खराब हो गई है कि छाले पड़ गए हैं, सूजन आ गई है, घाव हो रहे हैं, चलना बस की नहीं है, फिर भी मजबूरी है चलना क्योंकि हमने आस्था के नाम पर यही सुना है, कि अब पैदल यात्रा ही करनी है। कई सौ किलोमीटर की यात्रा में बरसात व गर्मी को झेलने से वायरल का फैलना, बुखार सर्दी जुखाम की परेशानिया होना आम बात है। हर साल सावन में कांवड़ यात्रा में हादसे होते हैं, और बहुत से लोगो के जीवन का अंत हो जाता है, और फिर उनके परिवार वाले जीवन भर इसका दुखः झेलते हैं। हरिद्वार में जाकर 5 रू के काम के मजबूरी में 100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जहाँ 50रू में पेट भर अच्छा खाना मिल जाता है वहां 200रू में भी पेट नहीं भरता। किसी को समान चोरी का दुख, तो किसी को शारीरिक व मानसिक कष्ट। चलो जो कावंड ला रहे हैं, वो तो परेशान हो ही रहे हैं अंधविश्वास के लिए, परंतु उनके इस कृत्य से पूरा प्रशासन परेशान हो रहा है। उनकी सुरक्षा को लेकर, उनके उपद्वव को लेकर, पूरी व्यवस्था में हजारों लोग तैनात हैं कि कहीं कोई अप्रिय घटना ना घट जाए। और हजारों ऐसे लोग जो रोजाना कमाते है तब खाते हैं उनके काम 8 दिन तक बंद हो जाते हैं। इसकी वजह से वह भी शायद अपने मन से कहीं ना कहीं इन को बुरा ही कहते होंगे। सभी स्कूल बंद करने पड़ते हैं आठ दिन तक जिससे बच्चों की शिक्षा पर प्रभाव पढ़ता है। हजारों लोग नौकरी पर नहीं जा पाते, फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ती हैं, करोड़ों रुपए का आर्थिक नुकसान होता है इस अंधविश्वास से। इस प्रकार हमारे भारत में बहुत से अंधविश्वास है जिनको हम आस्था के नाम पर निभा रहे हैं, परन्तु इनको करने से मिलता तो कुछ नहीं, पर खोते बहुत कुछ है।
अब देखते हैं, कावंड का अध्यात्मिक रहस्य क्या है। हम सभी इच्छाओं को पूरी करने के लिए अंधविश्वास में दौड़ लगाते हैं। और लाखों लोगों में कुछ की इच्छाएं पूरी होती हैं कैसे। हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र होते हैं और जिनमें स्वाधिष्ठान चक्र हमारी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है। मनुष्य इस चक्र को जब जागृत करता है, तो उसकी जो भी इच्छाएं होती हैं, वो घटित हो जाती हैं। परंतु यह उसकी श्रद्वा और विश्वास के साथ कार्य करता है। इस को जागृत करने का मूल मंत्र बं (बम) हैं। और जब हम कावड़ लाते हैं तो लगाता बम बम का उच्चारण करते रहते हैं, और उस बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र में जागृति पैदा होती है, और उस समय आस्था की वजह से हमारे मन में शंका व अविश्वास भी नहीं होता है, तो हम जो इच्छा लेकर कावड़ ला रहे हैं वह घटित हो जाती है। पर कितने लोग इस श्रद्धा व विश्वास के साथ कावंड ला रहे हैं शायद बहुत कम। इसलिए लाखों में कुछ लोगों की इच्छा ही पूरी हो पाती हैं, बाकी सब व्यक्ति व्यर्थ ही परेशान होते हैं।
अब जब हमें पता होता है, कि हम केवल बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करके अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं तो इतना कर्मकांड क्यों, यही अंधविश्वास है। हमारे संतो ने स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने के लिए इसके रहस्य को आस्था से जोड़ दिया और लोग इस आस्था के नाम पर अंधविश्वास में दौड़ लगाने लगे। आध्यात्मिकता के साथ कुछ शारीरिक लाभ भी मिलते हैं जैसे कष्टों को झेलने से आपकी प्रतिरोधक क्षमता व सहनशक्ति बढ़ती है। आपके अंदर संकल्प को पूरा करने की इच्छा शक्ति मजबूत होती है और श्रद्धा व विश्वास बढ़ता है पर क्या इसको पाने के लिए इतना सब कुछ करना उचित है सोचे?
स्वामी जगतेश्वर आनंद जी (स्वंतत्र लेखक व समाजिक कार्यकर्ता) मो.नं. 9958502499
आज करोड़ों लोग आस्था के नाम पर हरिद्वार पहुंच रहे हैं। शायद प्रत्येक के मन में यह अंधविश्वास है कि शिव मंदिर में जल चढ़ाने से मन की इच्छाएं पूरी हो जाएंगी, हमारे पाप कम हो जाएंगे या कुछ पुण्य कमा लेंगे, आज के विज्ञानिक व आध्यात्मिक युग की गहराइयों को जानने वाले भारत में इतना बड़ा अंधविश्वास केवल यह दर्शाता है कि लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कितने पागल हैं, या उनके मन की चंचलता का इससे पता चलता है कि वो संन्तुष्ट नहीं हैं।
आज अगर सभी कावड़ लाने वाले वालों से एक सवाल पूछा जाए कि आपको कावड़ लाने के बाद क्या ऐसा मिल जाएगा जो न लाने वाले को नहीं मिलेगा, शायद किसी के पास भी इसका कोई सटीक जवाब नहीं होगा। वह एक अंधविश्वास जो सदियों से चला रहा है, हम उसी के पीछे दौड़ रहे हैं, और उसके पीछे छुपे रहस्य को भूल जाते हैं, जो सच था वह कहीं खो जाता है।
सत्य की बात बाद में करेंगे आईये पहले देखते हैं की कावड़ लाने वालों को क्या-क्या मिल रहा है। करोड़ो लोग पैदल यात्रा कर रहे हैं, उनके पैरों की हालत इतनी खराब हो गई है कि छाले पड़ गए हैं, सूजन आ गई है, घाव हो रहे हैं, चलना बस की नहीं है, फिर भी मजबूरी है चलना क्योंकि हमने आस्था के नाम पर यही सुना है, कि अब पैदल यात्रा ही करनी है। कई सौ किलोमीटर की यात्रा में बरसात व गर्मी को झेलने से वायरल का फैलना, बुखार सर्दी जुखाम की परेशानिया होना आम बात है। हर साल सावन में कांवड़ यात्रा में हादसे होते हैं, और बहुत से लोगो के जीवन का अंत हो जाता है, और फिर उनके परिवार वाले जीवन भर इसका दुखः झेलते हैं। हरिद्वार में जाकर 5 रू के काम के मजबूरी में 100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जहाँ 50रू में पेट भर अच्छा खाना मिल जाता है वहां 200रू में भी पेट नहीं भरता। किसी को समान चोरी का दुख, तो किसी को शारीरिक व मानसिक कष्ट। चलो जो कावंड ला रहे हैं, वो तो परेशान हो ही रहे हैं अंधविश्वास के लिए, परंतु उनके इस कृत्य से पूरा प्रशासन परेशान हो रहा है। उनकी सुरक्षा को लेकर, उनके उपद्वव को लेकर, पूरी व्यवस्था में हजारों लोग तैनात हैं कि कहीं कोई अप्रिय घटना ना घट जाए। और हजारों ऐसे लोग जो रोजाना कमाते है तब खाते हैं उनके काम 8 दिन तक बंद हो जाते हैं। इसकी वजह से वह भी शायद अपने मन से कहीं ना कहीं इन को बुरा ही कहते होंगे। सभी स्कूल बंद करने पड़ते हैं आठ दिन तक जिससे बच्चों की शिक्षा पर प्रभाव पढ़ता है। हजारों लोग नौकरी पर नहीं जा पाते, फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ती हैं, करोड़ों रुपए का आर्थिक नुकसान होता है इस अंधविश्वास से। इस प्रकार हमारे भारत में बहुत से अंधविश्वास है जिनको हम आस्था के नाम पर निभा रहे हैं, परन्तु इनको करने से मिलता तो कुछ नहीं, पर खोते बहुत कुछ है।
अब देखते हैं, कावंड का अध्यात्मिक रहस्य क्या है। हम सभी इच्छाओं को पूरी करने के लिए अंधविश्वास में दौड़ लगाते हैं। और लाखों लोगों में कुछ की इच्छाएं पूरी होती हैं कैसे। हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र होते हैं और जिनमें स्वाधिष्ठान चक्र हमारी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है। मनुष्य इस चक्र को जब जागृत करता है, तो उसकी जो भी इच्छाएं होती हैं, वो घटित हो जाती हैं। परंतु यह उसकी श्रद्वा और विश्वास के साथ कार्य करता है। इस को जागृत करने का मूल मंत्र बं (बम) हैं। और जब हम कावड़ लाते हैं तो लगाता बम बम का उच्चारण करते रहते हैं, और उस बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र में जागृति पैदा होती है, और उस समय आस्था की वजह से हमारे मन में शंका व अविश्वास भी नहीं होता है, तो हम जो इच्छा लेकर कावड़ ला रहे हैं वह घटित हो जाती है। पर कितने लोग इस श्रद्धा व विश्वास के साथ कावंड ला रहे हैं शायद बहुत कम। इसलिए लाखों में कुछ लोगों की इच्छा ही पूरी हो पाती हैं, बाकी सब व्यक्ति व्यर्थ ही परेशान होते हैं।
अब जब हमें पता होता है, कि हम केवल बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करके अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं तो इतना कर्मकांड क्यों, यही अंधविश्वास है। हमारे संतो ने स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने के लिए इसके रहस्य को आस्था से जोड़ दिया और लोग इस आस्था के नाम पर अंधविश्वास में दौड़ लगाने लगे। आध्यात्मिकता के साथ कुछ शारीरिक लाभ भी मिलते हैं जैसे कष्टों को झेलने से आपकी प्रतिरोधक क्षमता व सहनशक्ति बढ़ती है। आपके अंदर संकल्प को पूरा करने की इच्छा शक्ति मजबूत होती है और श्रद्धा व विश्वास बढ़ता है पर क्या इसको पाने के लिए इतना सब कुछ करना उचित है सोचे?
स्वामी जगतेश्वर आनंद जी (स्वंतत्र लेखक व समाजिक कार्यकर्ता) म.नं. 9958502499
आज करोड़ों लोग आस्था के नाम पर हरिद्वार पहुंच रहे हैं। शायद प्रत्येक के मन में यह अंधविश्वास है कि शिव मंदिर में जल चढ़ाने से मन की इच्छाएं पूरी हो जाएंगी, हमारे पाप कम हो जाएंगे या कुछ पुण्य कमा लेंगे, आज के विज्ञानिक व आध्यात्मिक युग की गहराइयों को जानने वाले भारत में इतना बड़ा अंधविश्वास केवल यह दर्शाता है कि लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कितने पागल हैं, या उनके मन की चंचलता का इससे पता चलता है कि वो संन्तुष्ट नहीं हैं।
आज अगर सभी कावड़ लाने वाले वालों से एक सवाल पूछा जाए कि आपको कावड़ लाने के बाद क्या ऐसा मिल जाएगा जो न लाने वाले को नहीं मिलेगा, शायद किसी के पास भी इसका कोई सटीक जवाब नहीं होगा। वह एक अंधविश्वास जो सदियों से चला रहा है, हम उसी के पीछे दौड़ रहे हैं, और उसके पीछे छुपे रहस्य को भूल जाते हैं, जो सच था वह कहीं खो जाता है।
सत्य की बात बाद में करेंगे आईये पहले देखते हैं की कावड़ लाने वालों को क्या-क्या मिल रहा है। करोड़ो लोग पैदल यात्रा कर रहे हैं, उनके पैरों की हालत इतनी खराब हो गई है कि छाले पड़ गए हैं, सूजन आ गई है, घाव हो रहे हैं, चलना बस की नहीं है, फिर भी मजबूरी है चलना क्योंकि हमने आस्था के नाम पर यही सुना है, कि अब पैदल यात्रा ही करनी है। कई सौ किलोमीटर की यात्रा में बरसात व गर्मी को झेलने से वायरल का फैलना, बुखार सर्दी जुखाम की परेशानिया होना आम बात है। हर साल सावन में कांवड़ यात्रा में हादसे होते हैं, और बहुत से लोगो के जीवन का अंत हो जाता है, और फिर उनके परिवार वाले जीवन भर इसका दुखः झेलते हैं। हरिद्वार में जाकर 5 रू के काम के मजबूरी में 100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जहाँ 50रू में पेट भर अच्छा खाना मिल जाता है वहां 200रू में भी पेट नहीं भरता। किसी को समान चोरी का दुख, तो किसी को शारीरिक व मानसिक कष्ट। चलो जो कावंड ला रहे हैं, वो तो परेशान हो ही रहे हैं अंधविश्वास के लिए, परंतु उनके इस कृत्य से पूरा प्रशासन परेशान हो रहा है। उनकी सुरक्षा को लेकर, उनके उपद्वव को लेकर, पूरी व्यवस्था में हजारों लोग तैनात हैं कि कहीं कोई अप्रिय घटना ना घट जाए। और हजारों ऐसे लोग जो रोजाना कमाते है तब खाते हैं उनके काम 8 दिन तक बंद हो जाते हैं। इसकी वजह से वह भी शायद अपने मन से कहीं ना कहीं इन को बुरा ही कहते होंगे। सभी स्कूल बंद करने पड़ते हैं आठ दिन तक जिससे बच्चों की शिक्षा पर प्रभाव पढ़ता है। हजारों लोग नौकरी पर नहीं जा पाते, फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ती हैं, करोड़ों रुपए का आर्थिक नुकसान होता है इस अंधविश्वास से। इस प्रकार हमारे भारत में बहुत से अंधविश्वास है जिनको हम आस्था के नाम पर निभा रहे हैं, परन्तु इनको करने से मिलता तो कुछ नहीं, पर खोते बहुत कुछ है।
अब देखते हैं, कावंड का अध्यात्मिक रहस्य क्या है। हम सभी इच्छाओं को पूरी करने के लिए अंधविश्वास में दौड़ लगाते हैं। और लाखों लोगों में कुछ की इच्छाएं पूरी होती हैं कैसे। हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र होते हैं और जिनमें स्वाधिष्ठान चक्र हमारी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है। मनुष्य इस चक्र को जब जागृत करता है, तो उसकी जो भी इच्छाएं होती हैं, वो घटित हो जाती हैं। परंतु यह उसकी श्रद्वा और विश्वास के साथ कार्य करता है। इस को जागृत करने का मूल मंत्र बं (बम) हैं। और जब हम कावड़ लाते हैं तो लगाता बम बम का उच्चारण करते रहते हैं, और उस बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र में जागृति पैदा होती है, और उस समय आस्था की वजह से हमारे मन में शंका व अविश्वास भी नहीं होता है, तो हम जो इच्छा लेकर कावड़ ला रहे हैं वह घटित हो जाती है। पर कितने लोग इस श्रद्धा व विश्वास के साथ कावंड ला रहे हैं शायद बहुत कम। इसलिए लाखों में कुछ लोगों की इच्छा ही पूरी हो पाती हैं, बाकी सब व्यक्ति व्यर्थ ही परेशान होते हैं।
अब जब हमें पता होता है, कि हम केवल बम बम के उच्चारण से स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करके अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं तो इतना कर्मकांड क्यों, यही अंधविश्वास है। हमारे संतो ने स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने के लिए इसके रहस्य को आस्था से जोड़ दिया और लोग इस आस्था के नाम पर अंधविश्वास में दौड़ लगाने लगे। आध्यात्मिकता के साथ कुछ शारीरिक लाभ भी मिलते हैं जैसे कष्टों को झेलने से आपकी प्रतिरोधक क्षमता व सहनशक्ति बढ़ती है। आपके अंदर संकल्प को पूरा करने की इच्छा शक्ति मजबूत होती है और श्रद्धा व विश्वास बढ़ता है पर क्या इसको पाने के लिए इतना सब कुछ करना उचित है सोचे?
स्वामी जगतेश्वर आनंद जी (स्वंतत्र लेखक व समाजिक कार्यकर्ता) मो.नं. 9958502499
Tuesday, 12 July 2016
संभोग से आनंद की ओर 16 - अतृप्ति का कारण
संभोग से आनंद की ओर 16 - अतृप्ति का कारण
अतृप्ति की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी होती हे, शायद बचपन से, जहाँ से लिंगो मे भेदभाव किया जाता हे, वहाँ से
। लड़कों व लडकियों मे भेदभाव एक हीन भावना पैदा करता है, ओर जीवन भर यह विचार कि मे नारी हूँ, अलग हूँ, केवल इसी बात से जीवन के हर मोड पर समझोता करती जाती है, ओर
जब शादी तक बात पहुँचती है, तो उसके बहुत से स्वप्न होते हे, लडके को लेकर, परिवार को लेकर, उसके विचारों को लेकर, ओर जब लडके को देखा जाता हे तो जरूरी नही वह उसकी भावना के
अनुरूप मिले, परन्तु वहां भी वह
समझोता कर लेती हैं। कभी समाजिक परिस्थितियों के कारण (बिरादरी, दान, दहेज, अदि) तो कभी
परिवारिक परिस्थितियों के कारण।
अब
अंतिम इच्छा प्रेम आनंद या संभोग मे तृप्ति की होती है, ओर किसी कारण से अगर वहाँ
वह तृप्त नही हुई, तो वही से वह विखर जाती हैं। चाह कर भी समझोता करना कठिन होता
है, ओर फिर जहाँ कहीं भी उसकी भावना पूर्ण होती दिखाई देती है, वह वहाँ सर्वस्व
निछावर कर देती हैं। काश: शुरू मे ही उसकी भावनाओं का ख्याल किया होता तो यह
बिखराव ही पैदा न होता।
इस प्रकार ऊर्जा का संचय ओर आनंद की पराकाष्ठा हमारे बिखराव भटकाव ओर
अत्याचार को रोकता है। परिवार को टूटने से बचाने के लिये इस प्रकार हमें अपने संचय
को बढ़ाना है। शादी से पहले अप्राकृतिक संभोगो से बचना है। मन की हीन भावनाओं का
त्याग करना हैं। ओर शादी से पहले भी यदि हमें संभोग करना हो तो प्राकृतिक व्यवस्था
के अनुरूप संयम के साथ ऊर्जा का संचय करना
है। जिससे जीवन मे आगे बढ़ने के लिये उत्साह प्राप्त हो न कि हीन भावना ओर
नीरसता
संभोग से आनंद की ओर 15 - संभोग से अतृप्ति
संभोग से आनंद की ओर 15 - संभोग से अतृप्ति
चलिये
प्रेम की बात करते हैं। प्रेम प्यार जो हर व्यक्ति को होता हैं। हम विपरीत लिंगी के प्रति आकृषित होते हे ओर वह आकृषण ही
प्यार कहलाता हैं। परन्तु जब हम उस साथी के साथ एक बार सैक्स कर
लेते हे तो या तो वह प्रेम की भावना बढ़ जाती है या खत्म हो जाती हैं। कभी कभी तो दो चार बार सैक्स करने के बाद वह प्रेमी एक
दूसरे से दूर होने लगते है जो एक दूसरे पर जान छिड़कते थे कयो ? क्योंकि उन्होंने उस शक्ति को नही जाना ओर जैसे
ही वो उस आनंद के पास पहुंचे स्खलन हो गया ओर निस्तेजता छा गयी, इंद्रिये सुख तो मिला परन्तु आत्मिक तृप्ति नही
हुई, ओर अगर आत्मिक तृप्ति मिल जाती तो हमारा आर्कषण
बढ़ जाता, ओर संबंधो मे घनिष्ठा आ जाती क्योंकि उस तृप्ति
से आनंद की प्राप्ति हुई है, ऊर्जा का सचय हुआ
है। परन्तु ऐसा क्यों होता है कि हम केवल इंद्रिये तृप्ति तक ही सीमित रहकर सैक्स
करते हैं। इससे अधिक नही, ओर रिश्तों मे दूरियां आती जाती
हैं। क्योंकि हमें किसी ने रास्ता नही दिखाया। आज तो आनंद की
कल्पना भी करना दुसाध्य होता जा रहा है। क्योंकि जब हम 15-16 वर्ष की अवस्था मे
होते है तभी से उस ऊर्जा को ह्रास कर तृप्त होना चहाते है, ओर अप्राकृतिक क्रियाएँ
अपनाते है, जिससे कुछ दिनों तक
तो तृप्ति मिलती हैं, परन्तु जब संभोग का मौका मिलता है तो वह संयम के लायक नही
रहता ओर अपने साथी को अतृप्त ही छोड़ देता हैं। वहीं से दूरियां शुरू हो जाती हैं। कुंठाऐ पैदा होने लगती है ओर फिर जीवन भर वह उन कुंठाऔ के
सहारे आत्म द्रंद मे उलझा हुआ तनाव युक्त जीवन व्यतीत करता हैं। ऐसी स्थिति स्त्री
पक्ष से भी होती हैं। दोनों की एक सी ही हालत हैं। आज दोनों ही अप्राकृतिक तरीके अपनाते है फिर वह अतृप्त
स्त्री पुरुष अपनी तृप्ति का रास्ता ढूंढते हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते है ओर जो प्रेम संबंध
मधुर बन जाता वह बिखर कर तलाक नामे मे बदल जाता है या जीवन जीना दुर्लभ हो जाता हैं। आजकल बढती आत्महत्या भी इसी अतृप्ति का कारण हैं।
शादी का पहला दिन सुहागरात बनाने की परम्परा से
जीवन की शुरुआत होती हैं। जिसका मुख्य भाग सभोग ही है। यदि पहली रात
दोनों एक दुसरे को तृप्त कर पाये ऊर्जा का संचय कर पाये, आनंद की पराकाष्ठा को पार कर सके तो उनके जीवन
की शुरुआत अनन्त प्रेम के साथ होगी नहीं तो अतृप्ति मे कुंठाओ के साथ, ओर ये कुंठाऐ ही सभी यौन अपराधों की जननी होती हैं। अतृप्ति से ही अत्याचार बढ़ते हैं।
संभोग से आनंद की ओर 14- संभोग ध्यान की अवस्था
संभोग से आनंद की ओर 14- संभोग ध्यान की अवस्था
सही मे संभोग एक प्रकार के ध्यान की उच्चतम अवस्था ही हैं। मनुष्य जितनी ऊर्जा व शक्ति इस कार्य मे खर्च करता हे उतनी
किसी ओर कार्य मैं नही, वह इतने मनोयोग से
इस कार्य को करता है कि उसकी सम्पूर्ण चितवृतियाँ एकीकरण व केंद्रीयकरण हो जाती है,
ओर संभोग की चरम सीमा पर कुछ पल ध्यान दे तो आनंद की पराकाष्ठा वाली भावना आ जाती
है, ओर शरीर के सभी अंगों को क्रियामय रखकर अलोकिक शक्ति प्राप्त की जा सकती हैं।
माँ काली ओर शिव का संभोग, यौनि के साथ लिंग
की पूजा, राधा कृष्ण का प्रेम, विभिन्न गुफाओ मै संभोगकृत मूर्तियाँ ये सभी इसी
ओर संकेत करती हे, कि संभोग केवल भोग नही साधना है। उस आनंद रूप को जानने का, इस
प्रकार संभोग, परमानंद की वह दशा है
जिसका वर्णन नही किया जा सकता। केवल ओर केवल अनुभव करके ही जाना जा सकता हैं। ओर कोई माध्यम नही हैं।
संभोग से आनंद की ओर 13- ऊर्जा का चक्र
संभोग से आनंद की ओर 13- ऊर्जा का चक्र
स्त्री व पुरूष परस्पर विपरीत परन्तु
एक दूसरे को आकृषित करनेवाली शक्तियाँ हैं। प्रत्येक मनुष्य के शरीर से हर समय
ऊर्जा निकलती रहती हैं। जिसे आभामण्डल कहा जाता हैं। यह सामान्य आँखों से दिखाई नही देता परन्तु अपना
अस्तित्व रखता हैं। अपना प्रभाव डालता हैं। यह प्रत्येक शरीर का अलग अलग होता है ओर इसका प्रभाव उन सभी पर पडता हे
जो सम्पर्क मे आते है। इस प्रकार यह आर्कषण प्राकृतिक हैं। यह ऊर्जा पैदा करने से बढ़ जाता हैं। आज आभामण्डल से रोगों का एवम् आपकी आदतों का पता चल जाता हैं। पूरे अस्तित्व
को यह आभामण्डल दर्शाता हैं। तथा जब हम ऊर्जा का प्रयोग करते हे तो इसमें
तीव्र वृद्धि होती हैं। जिससे हमारे चारों तरफ प्रसन्नता, निरोगता, व अर्कषण अर्थात प्रेम की अनुभूतियाँ होती हैं।
संभोग के समय शरीर की प्रत्येक ग्रन्थि काम करने लगती हैं। प्रत्येक ग्रन्थि से स्राव होने लगता हैं। सभी अंग तीव्रता से काम करने लगते हैं। साँसो की गति बढ़
जाती हैं। नाड़ी 100 से भी ज्यादा बार धड़कने लगती हैं। तापमान 105°-106°F तक आ जाता हैं। जो सामान्य अवस्था मे मृत्यु का कारण बन सकता हैं। आखिर ये चमत्कार क्या है, क्यों मनुष्य सुधबुध खो देता है, इक
अनजानी दुनिया मे चला जाता हैं। विज्ञान के पास इन बातों का कोई जबाब नही है कि
उस समय इतनी ऊर्जा कैसे उत्पन्न होती हैं।Monday, 30 May 2016
संभोग से आनंद की ओर 12- मोह ममता व सैक्स
संभोग से आनंद की ओर 12- मोह ममता व सैक्स
सभी मोह ममता का तार सैक्स से जुड़ा है। हमे आपने चारों ओर
जो कुछ भी दिखाई देता हे वह किसी न किसी रुप मे सैक्स से ही जुडा हैं। सारा चराचर
जगत इसी धुरी पर चल रहा हैं। इस मायाजाल को प्रकृति ने काम की संज्ञा दी हे जो
सम्पूर्ण जीवन के अस्तित्व का आधार हैं। काम की साधना से ही हम सबकुछ पा लेते हैं।
यौनि का संबंध संभोग से ही नहीं, सम्पूर्ण विराट
विस्व से हे जो इसमे समाहित हैं। यौनि अर्थात स्त्री की पूजा कामाख्या व देवी रूप
मे इसलिए की जाती हे कि वह केवल उदगम स्थल ही नही, निर्माण प्रक्रिया भी करती हे इसीलिये स्त्री को पुरूषों
से बड़ा माना गया है। अतः स्त्री ही मौक्ष का दरवाजा हे, इसके बिना शरीर का पैदा होना संभव नही हैं
इसीलिए इसे महामाया भी कहा गया हैं।
मनुष्य
की आत्मा कभी नहीं मरती, यह सत्य हे कोई भी
वस्तु नष्ट नही होती हैं। उसके मूल तत्व हमेशा बने रहते हैं। केवल रुप बदलता हैं ।
सूक्ष्म से स्थूल व स्थूल से सूक्ष्म मे परिवर्तन होता है। शरीर पंचतत्व से बना है
वह बिखर जाते हैं, परन्तु आत्मा का
अस्तित्व बना रहता हैं, ओर फिर वह एक नये
रूप मैं जन्म लेती हैं। इसका माध्यम भी कामभावना हैं। स्त्री पुरूष के मिलन के
द्वारा ही यह परिवर्तन संभव हैं। अतः काम के समय उत्पन्न ऊर्जा मे इतनी शक्ति होती
है कि वह अपने अनुरूप एक जीव की सूक्ष्म रचना कर देती हैं जो धीरे धीरे पूरे शरीर
का रूप ले लेती हैं। ओर फिर इसी शरीर के द्वारा मौक्ष आनंद तृप्ति सब संभव होता
हैं।
संभोग से आनंद की ओर 11- मनुष्य जीवन की स्त्री से घनिष्ठा
संभोग से आनंद की ओर 11- मनुष्य जीवन की स्त्री से घनिष्ठा
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मनुष्य का सारा जीवन स्त्री के निकट ही घूमता रहता है। स्त्री ही सम्पूर्ण जीवन का केंद्र बिन्दु है, स्त्री से इसका जन्म होता हे, स्त्री इसका पालन करती है ओर बडे होने पर स्त्री का ही भोग करता है, इसलिये जब सम्पूर्ण जीवन ही स्त्री के साथ चलता हे तो क्यों न इसका प्रयोग कर हम अपने जीवन को उस सम्पूर्ण आनंद व शान्ति से भर दे जहाँ कोई तनाव बाकी न रहे स्त्री (पत्नी) हमें वो आनंद का स्रोत हे जो अनेक रुप से हमें शक्ति देती हैं ओर हमसे शक्ति प्राप्त करती हैं। यदि हम सेक्स के समय अतृप्त रह जाते है तो स्त्री परपुरुष गामिनी ओर पुरूष परस्त्रीगामी हो जाते हैं। ओर जब उससे भी तृप्ति नहीं होती तो फिर अगला पुरूष या स्त्री। यह बात दोनों पर ही लागू होती है ओर पुरुषों द्वारा किए जाने वाले बलात्कार भी इसी कारण होते हैं। वह दूसरी स्त्री मे उस तृप्ति को पाने की कोशिस करता हे ओर इस कदर यह दबाव मन पर पड़ता हे कि वह अपराध कर गुजरता हैं।
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इस प्रकार इस तरह के जितने भी यौन अपराध हे उनका संबंध चाहे वह बलात्कार के हो, छेड़छाड़ के हो या अनेक स्त्रियों से संबंध बनाने से हो वह सब हमारी सेक्स भावना की अतृप्ति से ही जाग्रत होते है ओर हम अपराध कर जाते हैं। सेक्स से हमे तृप्ति व आनंद नहीं मिला ब्लकि केवल शक्ति का ह्रास हुआ ओर हम निस्तेज हो गये ।
हमें इस संभोग को आनंद की उस चरम सीमा (तृप्ति) तक ले जाना हें कि फिर ओर कोई चाह न रहे तो अनेक अपराध रुक जायेगे, हमारे परिवार बिखरने से बच जायेगे, तलाक नामे होना खत्म हो जायेंगे, आपसी झगड़े मिट जायेंगे। एक दूसरे की कमियां भी जबहि दिखाई देती है जब हम अतृप्त होते हैं। जब हम तृप्त होते हे तो कमियां भी अच्छी लगती हैं। अतः तृप्ति कैसे हो समझे जाने ओर इसको अपनाये।
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Sunday, 8 May 2016
संभोग से आनंद की ओर 10- काम एक शक्ति है
संभोग से आनंद की ओर 10- काम एक शक्ति है
काम एक शक्ति हे जो मेथुन के समय प्रकट होकर दो
भागों मै बँट जाती है। इसका एक भाग बर्हिमुखी व दूसरा अंतमुर्खी है। एक भाग
प्रकृति की ओर ले जाता हे तो दूसरा निर्वृति की ओर, सेक्स का संयम जीवन को नियमित बनाने व पूर्ण आनंद के लक्ष्य
को प्राप्त करने मे सहायक हे इसलिए सेक्स व कामकीड़ा का ज्ञान स्त्री पुरुष दोनों
को ही होना जरुरी है तभी वह अंनन्त आनंद को भोग पाते हे, जिस प्रकार विधुत शक्ति मे आर्कषण व विर्कर्षण
दो शक्तियाँ विधमान हे परन्तु दोनों के मिलने से ही प्रकाश व गति का संचालन होता
है उसी प्रकार स्त्री व पुरुष के मिलने से सृष्टि का सृजन व आनंद की प्राप्ति होती
है।
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जहाँ शिव हे
वहाँ शक्ति हैं , शक्ति के बिना शिव
शव हैं, इसी प्रकार जहाँ पुरुष हे वहाँ स्त्री भी हे ओर
दोनों के होने पर ही वह पूर्ण है, नहीं तो अकेले एक
कुछ नहीं कर सकता । इस परासुक्ष्म जगत मे सव कुछ विधमान हे , लेकिन उसको सक्रिय करने व इच्छित रुप देने के
लिए ऊर्जा की जरूरत होती है, ओर ऊर्जा ही सारे
पदार्थ की जनक है। सूर्य की ऊर्जा से ही पृथ्वी पर जीवन हैं। ओर ऊर्जा ही सर्व
शक्ति मान परम परमेश्वर का रुप है। ओर मैथुन के द्वारा विभिन्न प्रकार से ऊर्जाओ
का उत्पादन किया जाता हैं। अनेक विज्ञानिक अब यह मानते हे कि सेक्स पावर एक एनर्जी
है तो फिर इसका प्रयोग क्यों नहीं कर सकते हैं।
एक - 2
रतिक्रिया ऊर्जा के नये नये स्रोतों का सृजन करती है। स्त्री (-) व पुरष (+)
शक्तियाँ हे ओर जब यह शक्तियाँ टकराती है, घर्षण होता हे, रगड़ लगती हे तो विधुत उत्पन्न होती हे ओर इसी कारण उस समय
शरीर गर्म हो जाते हे, पसीने छूटने लगते
हे, श्वास की गति असमान्य रुप से बड़ जाती है
परन्तु आनंद प्राप्ति के लिए इसमे स्खलन वर्जित है, क्योंकि इसका प्रयोग केवल सन्तान उत्पन्न करते समय ही करना
हे, वाकी तो केवल आनंद ओर ऊर्जा को प्राप्त करने के
लिए करें तो जीवन पूर्ण आनंदमय बन जायेगा।
संयम को
बढ़ाना हे ओर स्खलन पर नियन्त्रण रखते हुऐ ही यह ऊर्जा उत्पन्न करनी हे, संभोग करते रहना, ऊर्जा को बढ़ाते रहना ओर स्खलन न होना एक महान साधना है।
उत्तेजना की चरम सीमा पर पहुँचने के बाद भी स्खलन न कर ऊर्जा को बनायें रखना, मन पर नियन्त्रण रखना ओर उस समय घटित होती हुई
घटनाओं पर अन्दर की ओर ध्यान लगाते हुए उस पल का अनुभव करना जहाँ सिर्फ आनंद हे ओर
कुछ नहीं, न विचार न कार्य न कल की चिंता न तनाव बस इसी
पल रुकना है, अनुभव करना हे शरीर
मे घटित प्रत्येक पल की घटना को। इस प्रकार भोग से योग की ओर बढ़ेंगे , शरीर के रोग खत्म होगे, वह
ऊर्जा शरीर मे स्थित अनेक दूषित विषाणु कीटाणुओ का नास कर देगी, ओर आनंद की तरंग से रोम रोम को भर देगी। उस समय
उच्च स्तर की ऊर्जा, जाग्रत होती हे ओर मन पूर्ण रुप से एकाग्र होता हैं। ओर इस
अनन्त ऊर्जा का जैसे ही आप ध्यान लगाते हे तो आप परम आनंद स्वरूप आपने आप को पाते
हैं।
Saturday, 7 May 2016
संभोग से आनंद की ओर 9-प्रेम व सेक्स
संभोग से आनंद की ओर 9-प्रेम व सेक्स
इसके लिए
हमें इसके पहलुओ को समझना होगा।सेक्स मनुष्य की मूल भावना हैं। जिसे प्रेम कहा
जाता हैं । इसका जीवन मैं इतना महत्व हे कि इसके बिना सृष्टि की रचना संभव नहीं
है। हमारे चारों तरफ जितने भी क्रियाकलाप है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
काम के साथ जुड़े हुए हैं। हमारे ग्रन्थो मे भी जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति के
लिए धर्म , अर्थ, काम, ओर मोक्ष का वर्णन किया हैं। अर्थात सभी एक दूसरे से जुड़े
हुए हैं। धर्म के साथ अर्थ ,अर्थ के साथ काम, ओर काम के साथ मोक्ष जुड़ा हुआ है। ओर इसी काम
को दर्शाने के लिए कामदेव (पुरुष) व रति (स्त्री) देवता के प्रतीक भी बनाये गये
हैं। काम व रति के अभाव मैं मनुष्य का हदृय कुंठाओ से भर जाता हैं ओर मति भष्ट हो
जाती हैं। काम के बिना जन्म संभव नहीं है ओर शरीर के बिना मौक्ष संभव नहीं हैं। इसलिए
आनंद को लक्ष्य बनाकर काम साधना का उपयोग करना चाहिए । काम की उत्पत्ति सृष्टि के
आरंभ के साथ ही हुई हैं ओर जीवन के हर पल मे इसका पूरा पूरा महत्व हैं।
मनुष्य
आनंद चहाता हैं ओर वह उसे पाने के लिये लालायित होता है। जीवन मे संभोग आनंद की
पराकाष्ठा है क्योंकि उस समय उसके अन्दर कोई भी विचार नही होता है वह निर्विचार
सिर्फ वर्तमान मे क्रियाशील हो रहा होता है ओर बिन्दु का आनंद रूपी अमृत नीचे की
ओर आकर आनंद की तृप्ति देता है। इस प्रकार काम का उपयोग सीमा मे कर उसे आनंद का
साधन बनाना केवल संयम के अधीन ही संभव हैं।
Wednesday, 4 May 2016
संभोग से आनंद की ओर 8- प्राचिन काल मे नारी व संम्भोग
संभोग से आनंद की ओर 8- प्राचिन काल मे नारी व संम्भोग
सभ्यता के उदय काल में नारी को सम्मान जनक शब्दो से पुकारा
जाता था। उसे देवी, कल्याणी, नारायणी, आदि नामो से सम्बोधित किया गया। वहाँ नारी व पुरूष को
पूर्णतया समान आधिकार थें। नारी पूर्णतया स्वतंत्र जीवन यापन करती थी वह स्वेच्छा
से पुरूष का चयन कर जीवन व्यतीत करती थी तथा चयन के बाद भी उसके शासन मे रहने को बाध्य
नही थी। उसे पुरूष का परित्याग करने का भी अधिकार था। व्यक्तिगत संबंध केवल प्रेम
पूर्ण व्यवहार पर ही आधारित थे अन्यथा नही।
देव
किरात तथा असुर युग तक आते-आते वैवाहिक संस्था का विकास हुआ, परन्तु उस समय भी नारी अबला नही थी। वह युद्
किया करती थी। समान शिक्षा मिला करती थी और वह पुरूष के बराबर अधिकारो से सुज्जित
थी। वहाँ भी कोई जाति बंधन नही था व नारी अपनी इच्छा अनुरूप पुरूष के साथ संभोग
करती थी और अनेक पुरूषो से भी संबध बनाने की आजादी थी। उस समय की नारी पति द्वारा
पूजनीय हुआ करती थी वह अराधित थी पति के द्वारा, एवं देवता तुल्य मानी जाती थी उस समय स्त्रीयो का सम्मान
सबसे अधिक था।
सत्युग
तक परिस्थियाँ बदलने लगी चन्द्रमा नें बृहस्पति की पत्नी का हरण किया और भोगा। फिर
बृहस्पति को वापस कर दिया परन्तु उस समय नारी को उसके बाद भी पूर्ण सम्मान मिलता
था। अर्थात् पर पुरूष गामनि के बाद भी वह पूर्ण समान्नित होती थी।
मनु के समय
से नारी के अधिकारो मे बदलाव आना शुरू हुआ। वहाँ भी सैक्स को बुरा नही माना जाता
था। अप्सरा व गणिकाऐ हुआ करती थी जो पूर्ण संभोग का आनन्द दिया करती थी। वह
क्रीड़ा स्त्रीयाँ कहलायी जाती थी। स्त्रीयाँ उस समय बाजार में भी बिकती थी, तारामति का बिकना उसी काल का है। सत्युग मे
स्त्रियाँ स्वेच्छा से संभोग की याचना कर सकती थी। अर्थववेद यम यमी संबाद में यमी
अपने भाई यम से सन्तान उत्पति को कहती है। इस प्रकार सतयुग मे भी स्त्रीयाँ संभोग
व सन्तान उत्पति के लिये स्वतन्त्र थी। तथा वह पुरूष का चयन करने मे भी स्वतन्त्र
थी उस समय नारी कई बार विवाह करती थी
वैदिक युग के
बाद धीरे - धीरे ये स्वतन्त्रता खोने लगी पुराण युग मे स्त्रीयो की स्वतन्त्रता
खोने लगी। बाल विवाह शुरू हो गये। विधवाओ का विवाह निषेद कर दिया गया और स्त्री को
भोग विलास की वस्तु समझा जाने लगा। वहाँ से समाज मे सैक्स के प्रति कुविचार व भ्रम
फैलना शुरू हुआ। और सैक्स व स्त्री धार्मिक संर्कीण विचारधारा की शिकार होकर रह
गई। धर्म शास्त्र युग संहिताओ का युग माना गया। यहाँ नारी को अबला का दर्जा दिया
गया। वह पराधीन परतंत्र व निसहाय और निर्बल बनती चली गयी। वह केवल पति के अनुसार
ही चलती थी यहाँ से संभोग की दिशा व दृष्टि बदल गयी। जिसे खुलापन व स्वतन्त्रता थी
वह पाप और निन्दक बन गया। मनु स्मृति ने साफ लिखा कि स्त्री कभी भी स्वतन्त्र रहने
योग्य नही है। साथ ही उसे पति की सेविका बना दिया गया, उसकी शिक्षा भी बन्द कर दी गयी, स्त्री को मनु ने दोगला रिस्ता दिया, जहाँ वह माता गुरू के रूप मे पूजनीय मानी वही
पत्नी के रूप मे उसे अपमानित किया गया।
फिर
बहुपत्नी प्रथा आयी। मुस्लिम शासन ने आकर नारी को और अधिक प्रतिबंधित कर दिया।
सतयुग व रामायण युग मे नारी को दासी बना दिया वही द्वापरयुग मे कृष्ण ने एक बार
फिर बराबरी का दर्जा देने की कोशिश की फिर वही प्रेम धारा को बहाँ दिया। राधा व
गोपियो के साथ रास रचाया, मित्रवत संबंध
बनायें, यहाँ नारी को नर के बराबर का दर्जा दिया गया और
एक बार फिर वही आनन्द का खुलापन समाज मे आया। किन्तु फिर जल्द ही आगे बोद्धकाल मे
नारी को उपभोग की वस्तु बना दिया गया। सम्राट अशोक के काल मे भी नारी पर अत्याचार
हुऐं और मुगल काल मे नारियाँ पर्दे के पीछे चली गयी परन्तु फिर पच्छिमीकरण का आगमन
हुआ ब्रिटिशकाल आया और नारियो के लिऐ आन्दोलन शुरू हो गयें। बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या वध, भूण हत्या, के खिलाफ आन्दोलन तो हुऐ पर सफल नही हुये ।
फिर
भारत आजाद हुआ परन्तु नारी को स्वतन्त्रता आज भी नही मिली। आज भी वो मानसिकता पैदा
नही हुई है। जहाँ नारी स्वयं अपना वर चुन सके या वह अपनी मर्जी से पुरूष से संबंध
बना सके। धर्म के ठेकेदार व सामाजिक व्यवस्था ऐसी बिगड़ी कि वह सुधारने की नाम ही
नही ले रही है। जिस समय सैक्स को पाप व निन्दक न समझा जाता था उस समय नारी यह
बलात्तकार व अत्याचार की शिकार नही होती थी। परन्तु आज के युग मे फिर क्रान्ति आ
रही है नारी व पुरूष समझ रहें है स्वन्तत्रता को, वह आजाद होना चाहते है। सैक्स के भय से अजाद होकर खुलकर बात
करना चाहते है। इसलिये जब भी मौका मिलता है वह खुलकर वार्तालाप करते है। और आज प्रत्येक
लडका प्रेमिका व लडकी प्रेमी की चाह रखते हैं। एक बार फिर वह समाज को बदल रहे है।
अपनी मर्जी से शादी कर रहे है, स्ंवय नारी पुरूष का
चयन कर रही है, चाहे लाख बंदिशे
क्यो न हो फिर भी सब कुछ घटित हो रहा है जो प्रेम की फिर वही परिभाषा लिखेगा जिसमे
सिर्फ आनन्द होगा और आनन्द होगा।
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